सोमवार, 2 मार्च 2015

वीर गोगाजी

गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 (950 AD के आस पास) में चुरू जिले के ददरेवा गाँव (राजस्थान) में हुआ था ।

वे राजा जेवर सिंह और रानी बाछल की इकलोती संतान थे उनके राज्य का नाम बागड़ था और उस का विस्तार हांसी (हरयाणा) तक था।

रानी बाछल की कोई संतान नही थी उन्होंने 12 साल तक  "गुरु गोरखनाथ जी" की पूजा की, "गुरु गोरखनाथ जी" भागवान शिव शंकर के बहुत बड़े भगत थे उन को भागवान शिव शंकर का अवतार भी कहा जाता है ।

जब "गुरु गोरखनाथ जी " बागड़ आये थे तब उन्होंने रानी बाछल को कहा के वो कल आये उस को दो पुत्रों का वरदान मिलेगा,
अगले  दिन रानी बाछल की जुड़वाँ बहन रानी काछल जल्दी वह जा कर वरदान ले आई ।

जब रानी बाछल वहा गयी तब "गुरु गोरखनाथ जी " ने और वरदान देने से मना कर दिया, काफी मिन्नते करने के बाद "गुरु गोरखनाथ जी" ने एक पुडिया, जिस को गूग्गल कहा जाता है वो दी और कहा इसे खा लेना, और साथ में से वरदान भी दिया के तुम्हारा जो पुत्र होगा वो बहुत बहादुर और शक्तिशाली होगा ।

रानी बाछल ने उस पुडिया को सभी ओरतों (जो बांज थी) के साथ मिल कर खाया, उन ओरतों में एक महल की पंडितानी और एक दासी थी. जिस बर्तन में वो दवाई खाई गयी थी उस बर्तन को एक घोड़ी ने भी चाट लिया था ।

फिर एक साल के बाद "गोगाजी" का जन्म हुआ और साथ साथ "नर सिंह पांडे" और "भज्जू कोतवाल" का भी जन्म हुआ, और उस घोड़ी ने भी "नीले घोड़े" को जन्म दिया ।

और इन सब से पहले रानी बाछल की जुड़वाँ बहन रानी काछल के दो पुत्र जन्म ले लेते है, उन का नाम अर्जन और सर्जन रखा जाता है।
जाहरवीर गोगाजी महाराज ।
वीर गोगाजी गुरुगोरखनाथ के परमशिस्य थे। चौहान वीर गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था , जहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं।
कायम खानी मुस्लिम समाज उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्‍था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।
मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए।
गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के राजपूत शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था।
लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। " राम बड़ो कै गुगो ! कै बड़ो तो है जकोई है पण सांपा हूँ बैर कुण करे। "
लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है।
गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। उक्त जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और वहीं है गोगादेव की घोड़े पर सवार मूर्ति।
भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और जन्म स्थान पर बने मंदिर पर मत्‍था टेककर मन्नत माँगते हैं।आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है. गोगाजी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकडी पर सर्प मूर्ती उत्कीर्ण की जाती है. लोक धारणा है कि सर्प दंश से प्रभावित व्यक्ति को यदि गोगाजी की मेडी तक लाया जाये तो वह व्यक्ति सर्प विष से मुक्त हो जाता है.
भादवा माह के शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की नवमियों को गोगाजी की स्मृति में मेला लगता है. उत्तर प्रदेश में इन्हें जहर पीर और मुसलमान इन्हें गोगा पीर कहते है ।

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