सोमवार, 2 मार्च 2015

पन्नाधाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान

रानी बाघेली !
भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है,
इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था |

ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया,
पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को |

रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |

28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया |
और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया |
इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे |
तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |

तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था |
उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी |
उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई |
यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |

छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |

यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर
राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी |

हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता? नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को !

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपका उद्देश्य कितना ही अच्छा हो, पर इन्टरनेट पर कॉपी पेस्ट ठीक नहीं समझा जा सकता. ऐसा कर आपने उन एब साइट्स के साथ भी अन्याय किया है जहाँ ये लेख पहले से उपलब्ध है|

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  2. Sir wh Gaoura dhay thi ... kya yh bageli dhay ma or yh gaura Dhaya ma same hi h kya .... plz btana जोधपुर रेलवे स्टेशन से हाई कोर्ट के मार्ग में पुराने स्टेडियम के पास चोराहे पर रेलवे लाइन की दीवार से सटी एक छह खम्बो वाली पुरानी छतरी बनी हुई है जो की गोरा धाय की छतरी कहलाती है | गोरा धाय जोधपुर नरेश अजित सिंह जी की धाय माता थी|गोरा धाय मंडोर के गोपा गहलोत की धर्म पत्नी थी और उसका जन्म १६४६ में हुवा था कहते है की मारवाड़ के शासक महाराजा जसवंत सिंह जी की म्रत्यु होने पर औरंगजेब ने मारवाड़ के सरदारों को झांसा देकर जसवंत सिंह जी की विधवा रानियों दिल्ली बुलवा लिया और मारवाड़ को खालसा कर लिया| औरंगजेब अजित सिंह जी को मुसलमान बनाना चाहता था किन्तु उसके कुटिल इरादों को भाप कर वीर दुर्गादास राठोड और मुकंद दास आदि सरदार गोरा धाय की सहायता से १६७९ में बालक अजित सिंह को सकुशल वहा से निकाल कर मारवाड़ ले आये और उसे सिरोही के कालन्द्री गाँव में छीपा कर रखा| बालक अजीत सिंह को दिल्ली से निकालने के लिए गोरा धाय ने मेहतरानी का स्वांग रचा था और युवराज को बचाने के लिए उसे अपने पुत्र की बलि देनी पड़ी थी| सन १७०४ में अपने पति की म्रत्यु होने पर गोरा धाय पति की चिता के साथ सती हो गई तब उसकी स्मृति में महाराजा अजीत सिंह जी ने १७११ में छह खम्बो वाली इस कलात्मक छतरी का निर्माण करवाया था|समय के साथ छतरी जीर्ण शीर्ण अवस्था में हो गई तब कुछ वर्ष पूर्व इसका जिर्णोधार करवाया गया और इस छतरी के चारो तरफ एक लोहे का जंगला लगवाया गया तथा इसके छह खम्बो में से एक के ध्वस्त हो जाने के कारण एक खम्बा नया लगवाया गया है तथा इसका शीला लेख नष्ट हो जाने के कारण मूल पाठ का पत्थर लगवाया गया|नमन है राजपूताने की इन धाय माताओं को|इस मार्ग से निकले तो इस छतरी के समक्ष श्रद्धा सुमन अवश्य अर्पित करे|

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