सोमवार, 15 जून 2015

1857 के क्रांतिकारी ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत (आउवा)

जिस तरह से वीर कुँवर सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए अपना रण-रंग दिखाया उसी तरह राजस्थान में आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने भी अपनी अनुपम वीरता से अंग्रेजो का मान मर्दन करते हुए क्रांति के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी ।
पाली ज़िले का एक छोटा सा ठिकाना था "आउवा" लेकिन ठाकुर कुशाल सिंह की प्रमुख राष्ट्रभक्ति ने सन् सत्तावन में आउवा को स्वातंत्र्य-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया । ठाकुर कुशाल सिंह तथा मारवाड़ का संघर्ष प्रथम स्वतंत्रता का एक स्वर्णिम पृष्ठ है।
जोधपुर के देशभक्त महाराजा मान सिंह के संन्यासी हो जाने के बाद अंग्रेजो ने अपने पक्ष के तख़्त सिंह को जोधपुर का राजा बना दिया । तख़्त सिंह ने अंग्रेजो की हर तरह से सहायता की ।
जोधपुर राज्य उस समय अंग्रेजो को हर साल सवा लाख रुपया देता था । इस धन से अंग्रेजो ने अपनी सुरक्षा के लिए एक सेना बनाई, जिसका नाम घ् जोधपुर लीजन ' रखा गया । इस सेना की छावनी जोधपुर से कुछ दूर एरिनपुरा में थी । अँग्रेज़ सेना की राजस्थान की छह प्रमुख छावनियों में यह भी एक थी ।
राजस्थान में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद से हुई थी । इसके बाद नीमच और देवली के भारतीय सैनिक भी संघर्ष में कूद चूके थे ।
अब बारी थी एरिनपुरा के घ् जोधपुर लीजन ' की, जिसे फ़िरंगियों ने ख़ासकर अपनी सुरक्षा के लिए बनाया था ।
सूबेदार गोजन सिंह का आबू पर हमला :-
जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह अंग्रेजो की कृपा से ही सुख भोग रहे थे, अतः स्वतंत्रता यज्ञ की जवाला भड़कते ही उन्होंने तुरंत अंग्रेजो की सहायता करने की तैयार कर ली । जोधपुर की जनता अपने राजा के इस आचरण से काफ़ी ग़ुस्से में थी ।
राज्य की सेना भी मन से स्वाधीनता सैनानियों के साथ थी तथा घ् जोधपुर लीजन ' भी सशस्त्र क्रांति के महायज्ञ में कूद पड़ना चाहती थी ।
नसीराबाद छावनी में क्रांति की शुरुआत होते ही जोधपुर-नरेश ने राजकीय सेना की एक टुकड़ी गोरों की मदद के लिए अजमेर भेद दी । इस सेना ने अंग्रेजो का साथ देने से इंकार कर दिया ।
कुशलराज सिंघवी ने सेनापतित्व में जोधपुर की एक और सेना नसीराबाद के भारतीय सैनिकों को दबाने के लिए भेजी गई । इस सेना ने भी अंग्रेजो का साथ नहीं दिया ।
हिण्डौन में जयपुर राज्य की सेना भी जयपुर नरेश की अवज्ञा करते हुए क्रांतिकारी भारतीय सेना से मिल गई । इस सब घटनाओं का अंग्रेजों की विशेष सेना घ् जोधपुर लीजन ' पर भी असर पड़ा । इसके सैनिकों ने स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने का निश्चय कर लिया।
अगस्त 1857 में इस घ् लीजन ' की एक टुकड़ी को रोवा ठाकुर के ख़िलाफ़ अनादरा भेजा गया । इस टुकड़ी के नायक हवलदार गोजन सिंह थे ।
रोवा ठाकुर पर आक्रमण के स्थान पर 21 अगस्त की सुबह तीन बजे यह टुकड़ी आबू पहाड़ पर चढ़ गई । उस समय आबू पर्वत पर काफी संख्या में गोरे सैनिक मौजूद थे ।
गोजन सिंह के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के स्वतंत्रता सैनिकों ने दो तरफ़ से फ़िरंगियों पर हमला कर दिया । सुबह के धुंधलके में हुए इस हमले से अँग्रेज़ सैनिकों में भगदड़ मच गई । आबू से अंग्रेजो को भगा कर गोजन सिंह एरिनपुरा की और चल पड़े । गोजन सिंह के पहुँचते ही लीजन की घुड़सवार टुकड़ी तथा पैदल सेना भी स्वराज्य-सैनिकों के साथ हो गई । तोपखाने पर भी मुक्ति-वाहिनी का अधिकार हो गया । एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने मेहराब सिंह को अपना मुखिया चुना । मेहराब सिंह को घ् लीजन ' का जनरल मान कर यह सेना पाली की ओर चल पड़ी ।
आउवा में स्वागत :-
आउवा में चम्पावत ठाकुर कुशाल सिंह काफ़ी पहले से ही विदेशी (अँग्रेज़ी) शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का निश्चय कर चुके थें । अँग्रेज़ उन्हें फूटी आँखों भी नहीं सुहाते थे । नाना साहब पेशवा तथा तात्या टोपे से उनका संपर्क हो चूका था । पूरे राजस्थान में अंग्रेजो को धूल चटाने की एक व्यापक रणनीति ठाकुर कुशाल सिंह ने बनाई थी ।
सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था । बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ' को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह अंग्रेजो के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे ।
इसीलिए जब जनरल मेहरबान सिंह की कमान में जोधपुर लीजन के जवान पाली के पास आउवा पहुँचे तो ठाकुर कुशाल सिंह ने स्वातंत्र्य-सैनिकों का क़िले में भव्य स्वागत किया ।
इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए । लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे ।
सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर अंग्रेजो से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे । स्वाधीनता सैनिकों की विशाल छावनी ही बन गया आउवा ।
दिल्ली गए सैनिकों के अतिरिक्त हर स्वातंत्रता-प्रेमी योद्धा के पैर इस शक्ति केंद्र की ओर बढ़ने लगे । अब सभी सैनिकों ने मिलकर ठाकुर कुशाल सिंह को अपना प्रमुख चुन लिया ।
मॉक मेसन का सर काटा :-
आउवा में स्वाधीनता- सैनिकों के जमाव से फ़िरंगी चिंतित हो रहे थे अतः लोहे से लोहा काटने की कूटनीति पर अमल करते हुए उन्होंने जोधपुर नरेश को आउवा पर हमला करने का हुक्म दिया ।
अनाड़सिंह की अगुवाई में जोधपुर की एक विशाल सेना ने पाली से आउवा की ओर कूच किया । आउवा से पहले अँग्रेज़ सेनानायक हीथकोटा भी उससे मिला । 8 सितम्बर को स्वराज्य के सैनिकों ने घ् मारो फ़िरंगी को ' तथा घ् हर-हर महादेव ' के घोषों के साथ इस सेना पर हमला कर दिया ।
अनाड़सिंह तथा हीथकोट बुरी तरह हारे । बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध में अनाड़ सिंह मारा गया और हीथकोट भाग खड़ा हुआ । जोधुपर सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा ।
इस सेना की दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा । 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया । ब्रिटानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रिटानियों पर टूट पड़े । चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई । मॉक मेसन युद्ध में मारा गया ।
क्रांतिकारियों ने उसका सिर काट कर उसका शव क़िले के दरवाज़े पर उलटा लटका दिया । इस युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह तथा स्वातंत्र्य-वाहिनी के वीरों ने अद्भूत वीरता दिखाई ।
आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है । एक लोकगीत इस प्रकार है |
ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो ।
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो ।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो,
मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो ।
इस बीच डीसा की भारतीय सेनाएँ भी क्रांतिकारियों से मिल गई । ठाकुर कुशाल सिंह की व्यूह-रचना सफ़ल होने लगी और अंग्रेजो के ख़िलाफ़ एक मजूबत मोर्चा आउवा में बन गया ।
अब मुक्ति-वाहिनी ने जोधपुर को अंग्रेजो के चंगुल से छुड़ाने की योजना बनाई । उसी समय दिल्ली में क्रांतिकारियों की स्थिति कमज़ोर होने के समाचार आउवा ठाकुर को मिले कुशल सिंह ने सभी प्रमुख लोगों के साथ फिर से अपनी युद्ध-नीति पर विचार किया ।
सबकी सहमति से तय हुआ कि सेना का एक बड़ा भाग दिल्ली के स्वाधीनता सैनिकों की सहायता के लिऐ भेजा जाए तथा शेष सेना आउवा में अपनी मोर्चेबन्दी मज़बूत कर ले । दिल्ली जाने वाली फ़ौज की समान आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह को सौंपी गई ।
शिवनाथ सिंह आउवा से त्वरित गति से निकले तथा रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया । उधर ब्रितानियों ने भी मुक्ति वाहिनी पर नज़र रखी हुई थी । नारनौल के पास ब्रिगेडियर गेरार्ड ने क्रांतिकारियों पर हमला कर दिया । अचानक हुए इस हमले से भारतीय सेना की मोर्चाबन्दी टूट गई । फिर भी घमासान युद्ध हुआ तथा फ़िरंगियों के कई प्रमुख सेनानायक युद्ध में मारे गए ।
बड़सू का भीषण संग्राम :-
जनवरी में मुम्बई से एक अंग्रेज फौज सहायता के लिए अजमेर भेजी गई । अब कर्नल होम्स ने आउवा पर हमला करने की हिम्मत जुटाई । आस-पास के और सेना इकट्ठी कर कर्नल होम्स अजमेर से रवाना हुआ ।
20 जनवरी, 1858 को होम्स ने ठाकुर कुशाल सिंह पर धावा बोला दिया । दोनों ओर से भीषण गोला-बारी शुरू हो गई ।
आउवा का किला स्वतंत्रता संग्राम के एक मजबूत स्तंभ के रूप में शान से खड़ा हुआ था । चार दिनों तक अंग्रेजो और मुक्ति वाहिनी में मुठभेड़ें चलती रहीं। अंग्रेजो के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हो रहे थे ।
युद्ध की स्थिति से चिंतित होम्स ने अब कपट का सहारा लिया । आउवा के कामदार और क़िलेदार को भारी धन देकर कर्नल होम्स ने उन्हें अपनी ही साथियों की पीठ में छुरा घौंपने के लिए राज़ी कर लिया ।
एक रात क़िलेदार ने कीलें का दरवाजा खोल दिया । दरवाज़ा खुलते ही अँग्रेज़ क़िले में घुस गए तथा सोते हुए क्रांतिकारियों को घेर लिया । फिर भी स्वातंत्र्य योद्धाओं ने बहादुरी से युद्ध किया, पर अँग्रेज़ क़िले पर अधिकार करने में सफल हो गए ।
पासा पटलते देख ठाकुर कुशाल सिंह युद्ध जारी रखने के लिए दूसरा दरवाज़े से निकल गए । उधर अंग्रेजो ने जीत के बाद बर्बरता की सारी हदें पार कर दी । उन्होंने आउवा को पुरी तरह लूटा, नागरिकों की हत्याएँ की तथा मंदिरों को ध्वस्त कर दिया । क़िले कि प्रसिद्ध महाकाली की मूर्ति को अजमेर ले ज़ाया गया । यह मूर्ति आज भी अजमेर के पुरानी मंडी स्थित संग्रहालय में मौजूद है ।
इसी के साथ कर्नल होम्स ने सेना के एक हिस्से को ठाकुर कुशाल सिंह का पीछा करने को भेजा । रास्ते में सिरियाली ठाकुर ने अंग्रेजों को रोका । दो दिन के संघर्ष के बाद अंग्रेज सेना आगे बढ़ी तो बडसू के पास कुशाल सिंह और ठाकुर शिवनाथ सिंह ने अंग्रेजों को चुनौती दी ।
उनके साथ ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह भी हो गए । बगड़ी ठाकुर ने भी उसी समय अंग्रेजों पर हमला बोल दिया । चालीस दिनों तक चले इस युद्ध में कभी मुक्ति वाहीनी तो कभी अंग्रेजों का पलड़ा भारी होता रहा । तभी और सेना आ जाने से अंग्रेजों की स्थिति सुधर गई तथा स्वातंत्र्य-सैनिकों की पराजय हुई । कोटा तथा आउवा में हुई हार से राजस्थान में स्वातंत्र्य-सैनिकों का अभियान लगभग समाप्त हो गया ।
आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने अभी भी हार नहीं मानी थी । अब उन्होंने तात्या टोपे से सम्पर्क करने का प्रयास किया । तात्या से उनका सम्पर्क नहीं हो पाया तो वे मेवाड़ में कोठारिया के राव जोधसिंह के पास चले गए । कोठारिया से ही वे अंग्रेजों से छुट-पुट लड़ाईयाँ करते रहे ।
ठाकुर कुशालसिंह के संघर्ष ने मारवाड़ का नाम भारतीय इतिहास में पुनः उज्ज्वल कर दिया । कुशाल सिंह पूरे मारवाड़ में लोकप्रिय हो गए तथा पूरे क्षेत्र के लोग उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानने लगे । जनता का उन्हें इतना सहयोग मिला था कि लारेंस तथा होम्स की सेनाओं पर रास्ते में पड़ने वाले गाँवों के ग्रामीणों ने भी जहाँ मौक़ा मिला हमला किया ।
इस पूरे अभियान में मुक्ति-वाहिनी का नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से भी संपर्क बना हुआ था । इसीलिए दिल्ली में स्वातंत्र्य-सेना की स्थिति कमज़ोर होने पर ठाकुर कुशाल सिंह ने सेना के बड़े भाग को दिल्ली भेजा था । जनता ने इस संघर्ष को विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध किया जाने वाला स्वाधीनता संघर्ष माना तथा इस संघर्ष के नायक रूप में ठाकुर कुशाल सिंह को लोक-गीतों में अमर कर दिया ।
उस समय के कई लोक-गीत तो आज भी लोकप्रिय हैं ।
होली के अवसर पर मारवाड़ में आउवा के संग्राम पर जो गीत गाया जाता है,
उसकी बानगी देखिये :-
वणिया वाली गोचर मांय कालौ लोग पड़ियौ ओ
राजाजी रे भेळो तो फिरंगी लड़ियो ओ
काली टोपी रो !
हाँ रे काली टोपी रो । फिरंगी फेलाव कीधौ ओ
काली टोपी रो !
बारली तोपां रा गोळा धूडगढ़ में लागे ओ
मांयली तोपां रा गोळा तम्बू तोड़े ओ
झल्लै आउवौ !
मांयली तोपां तो झूटे, आडावली धूजै ओ
आउवा वालौ नाथ तो सुगाली पूजै ओ
झगड़ौ आदरियौ !
हां रे झगड़ौ आदरियो, आउवौ झगड़ा में बांकौ ओ
झगडौ आदरियौ !
राजाजी रा घेड़लिया काळां रै लारे दोड़ै ओ
आउवौ रा घेड़ा तो पछाड़ी तोड़े ओ
झगड़ौ होवण दो !
हाँ रे झगड़ौ होवण दो, झगड़ा में थारी जीत व्हैला ओ
झगड़ौ होवण दो !

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