बुधवार, 29 जुलाई 2015

अनुठी वीरता जो अन्यत्र ना मिले

अजमेर पर चौहान राजवंश का राज था पृथ्वीराज चौहान के पुर्वजों ने ही अजमेर बसाया था ।
तारागढ़ व गढ़ बिठली जैसे नामों से जाना जाने वाला ये राजपूत शहर प्राचीन था और इसकी गौरव गाथा भी बङी समृद्ध रही है ।
अजमेर के बीच झील और पहाड़ियों से घिरा यह शहर उस काल में भी हर किसी को रोमांचित कर देने वाला था तो एक तरफ उँचि पहाङी पर बना सुदृढ़ किला चौहान वंश के यश का बखान करता था ।।
इस तराह कि भव्यता के और सुन्दरता होते किसी का मन राज-काज व मोह माया से उठकर भगवान कि भक्ति में लग जाना एक सच्चे क्षत्रिय तक ही सीमित है, हर कोई कर पाये संभव नही ।।
राजपूत जाति मे कभी भी इतिहास लेखन कि परम्परा नही रही थी इसी लिये उस काल का समयाकन में ठिक ठिक नहीं कर पाऊंगा ।।
यह बात है अजयराज जी चौहान कि उस समय बाहरी आक्रमणकारी भारत में प्रवेश कर चुके थे,
और उनके मुख्य उद्देश्य धर्म व लूट थे ।।
अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया ।
उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज जी चौहान राज्य भोग से दूर अजमेर कि पहाड़ियों में चले गये ।
उस समय मुस्लिम आक्रमणकारीयों द्वारा उस क्षेत्र में गायों को चरवाहो से जबरदस्ती ले जाने कि घटना घटित हुयी ।।
जब अजयराज जी चौहान को यह बात ज्ञात हुयी तो उसी समय उनके वृद्ध शरीर में फिर फुर्ती आ गयी और वह अपनी तलवार और घोड़ा लेकर गाय रक्षार्थ निकल पङे ।।
यह घटना सिर्फ जनश्रुतियों से ही ज्ञात होती है लिखित इतिहास कि कमी के चलते ।।
एक पुरी मुस्लिम सेना कि टुकङी से अकेला वृद्ध राजपूत जा टकराता है और इतना भीषण संग्राम होता है जिसकी कल्पना भी नही कि जा सकती है ।
इसी जगह वह वीर-गति को प्राप्त होते है ।।
सबसे रोचक घटना यहाँ यह है कि उनका सिर युद्ध करते समय अजमेर कि इन्हीं पहाड़ियों में कट जाता है और फिर भी उनका धङ रण जारी रखता है,
उनका धङ आक्रमणकारीयों को गुजरात के अंजार जिले तक खदेड़ता है ।।
गुजरात के अंजार जिले मे उनका धङ गिरा और वहाँ भी उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है वहाँ भी वह पूजे जाते है,
अजमेर के पास जहाँ सिर गिरा यहाँ भी उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है यहाँ भी उनकी पुजा होती है ।।
अजमेर से अंजार गुजरात कोई 400-500 किलोमीटर कि दूरी बिना सिर युद्ध करते हुवे जाना किसी क्षत्रिय के ही वश कि बात है अन्यत्र तो एसी कल्पना भी विध्यमान नही है ।।
लेखन - बलवीर राठौड़ डढेल ।।
साभार - जनश्रुतियाँ ।।

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