गुरुवार, 8 सितंबर 2016

जगदेव परमार

जगो यहाँ पर जगदेवों की लगी है बाजी जान की।
अलबेलों ने लिखी खड़ग से गाथाएँ बलिदान की।॥

जगदेव परमार मालवा के राजा उदयादित्य के पुत्र थे। मालवा की राजधानी धारानगरी थी जो कालान्तर में उज्जैन नगर के नाम से प्रसिद्ध हुई। मालवा के परमार वंश में हुए राजा भर्तृहरि बाद में महान नाथ योगी (सन्त) बने, भर्तृहरि के छोटे भाई राजा वीर विक्रमादित्य बड़े न्यायकारी राजा हुये। विक्रम सम्वत इसी ने हुणों पर विजय के उपलक्ष में चलाया था। विद्याप्रेमी एवं वीर भोज भी मालवा के परमार राजा थे, जो स्वयं विद्वान थे। बारहवीं शताब्दी में इस प्रदेश ने एक ऐसा अनुपम रत्न प्रदान किया जिसने वीरता और त्याग के नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर क्षात्र धर्म को पुनः गौरवान्वित किया। यह वीर थे जगदेव परमार। लोक गाथाओं में इन्हें वीर जगदेव पंवार के नाम से याद किया जाता है।

राजा उदयादित्य की दो पत्नियाँ थी। एक सोलंकी राजवंश की और दूसरी बाघेला राजवंश की। सोलंकी रानी के जगदेव नाम का पुत्र और बघेली रानी से दूसरा पुत्र रिणधवल था। राजकुमार जगदेव बड़ा थे। राजकुमार जगदेव साहसी योद्धा था और सेनापति के रूप में उसकी कीर्ति सारे देश में फैल गई थी। अपनी बाघेली रानी के प्रभाव से प्रभावित होकर उदयादित्य ने रिणधवल को युवराज चुना। अपनी सौतेली माता की ईर्ष्या के कारण जगदेव कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। वह मालवा से चले गये और जीविका के लिए गुजरात में सिद्धराज जयसिंह के अधीन सैनिक सेवा स्वीकार की। वह अपनी वीरता और स्वामीभक्ति से बहुत ही अल्पकाल में अपने स्वामी के प्रिय हो गये। कुछ आसन्न संकट से सिद्धराज की सुरक्षा करने के लिए अपने जीवन को अर्पण किया। जगदेव परमार ने कंकाळी (देवी) के सामने अपना मस्तक काट कर अर्पित कर दिया था, जिससे देवी ने उसके बलिदान से प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया था। जगदेव ने यह बलिदान अपने स्वामी पर आए संकट के अवसर पर दिया था। जब राजा को उसके इस बलिदान का पता लगा तो उसने प्रसन्न होकर उनको एक बहुत बड़ी जागीर दी। और अपनी एक पुत्री का विवाह जगदेव के साथ कर दिया।

कुछ समय बाद यह सूचना पाकर कि सिद्धराज मालवा पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहा है, उसने अपना पद त्याग कर अपनी जन्मभूमि की रक्षा करने के लिए धारा नगरी चला आया। उसके पिता ने उसका बड़े स्नेह से स्वागत किया और रिणधवल के स्थान पर जगदेव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उदयादित्य की मृत्यु के पश्चात् जगदेव मालवा के सिंहासन पर बैठे।

राजस्थान की लोक गाथाओं में वह जगदेव पंवार के नाम से जाने जाते है जबकि मालवा में लक्ष्मदेव के नाम से प्रसिद्ध हुये। जगदेव वि.सं. ११४३ (ई.स. १०८६) के लगभग मालवा के राजा बने। वह एक बड़ी सेना लेकर दिग्विजय के लिए निकले। बंगाल के पाल राजा पर आक्रमण कर वहाँ से बहुत से हाथी लूटकर लाये। इसके बाद चेदी प्रदेश के कलचुरियों पर आक्रमण करने के लिए बढे। उस समय वहाँ यश:कर्ण का राज्य था। यश:कर्ण साहसी योद्धा था और चम्पारण विजय कर कीर्ति प्राप्त की थी। किन्तु वह मालवा सेना के आक्रमण के सामने ठहर नहीं सका। जगदेव (लक्ष्मदेव) ने उसके राज्य को पद दलित किया और उसकी राजधानी त्रिपुरी को लूटा। उसने अङ्ग और कलिंग राज्य की सेनाओं को परास्त किया।
जगदेव ने दक्षिण भारतीय राज्यों पर भी आक्रमण किए थे। लेकिन दक्षिणी राज्यो में आपस में मैत्री होने से वह सफल न हो सके। मालवा के दक्षिण में चोलों का राज्य था। दोनों राज्यों के बीच बहुत कम दूरी रह गई थी। इस क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए दोनों ही राज्य लालायित थे अतः दोनों में युद्ध होना अवश्यंभावी हो गया। जगदेव का चोल राजा कुलोतुंग प्रथम से संघर्ष हुआ। युद्ध में चोल पराजित हुए।

गुजरात के सीमान्त पहाड़ी क्षेत्रों में बर्बर पहाड़ी जनजातियाँ निवास करती थी जो सन्त, पुण्यात्मा ऋषियों को निरन्तर दुःख देते थे। जगदेव ने उन बर्बर जातियों को दण्डित किया। कांगड़ा जनपद के कीरों से युद्ध कर उन्हें परास्त किया। उसके समय में मुसलमानों ने मालवा पर चढ़ाई की। मुस्लिम सेना को कुछ प्रारम्भिक विजय प्राप्त हुई। किन्तु अंततः वे जगदेव द्वारा पीछे ढकेल दिए गए। जगदेव (लक्ष्मदेव) एक वीर योद्धा और निपुण सेनानायक थे। पश्चिमी भारत के लोग अब भी जगदेव के नाम का उसकी उच्च सामरिक दक्षता व बलिदान के लिए हमेशा स्मरण करते हैं। निश्चय ही वे ग्यारहवीं शती के अन्तिम चरण का एक उतुंग व्यक्ति थे। एक उल्का की तरह वह थोड़े समय के लिए मध्यभारत के क्षितिज में चमके और अपने पीछे चिरकीर्ति छोड़ कर लोप हो गये। शासक के रूप में वह अत्यन्त दयालु, प्रजा वत्सल और न्यायकारी राजा थे। सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज की उदात्त परम्पराएं इन्होंने पुनः शुरु की। वेष बदल कर ये जनता की वास्तविक स्थिति का पता लगाने जाया करते थे। प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किये। इनका शासन काल लगभग वि.सं. ११५२ (ई.स. १०९५) तक रहा।

लेखक : छाजूसिंह, बड़नगर

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