शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

राजा रामशाह तौमर

इनकी भी याद करो कुर्वानी
हल्दी घाटी का विस्मरत बलिदानी।

वीरवार रामशाह महाराणा प्रताप के विश्वसनीय सहायकों में से एक थे।हल्दीघाटी के युद्ध में इन्होंने और इनके तीन पुत्रों एवंम एक पौत्र तथा चम्बल क्षेत्र के सैकड़ों राजपूतों ने भाग लिया था।प्रताप की सेना के दक्षिड़ी भाग का नेतृत्व रामशाह तौमर ने कीया था।इनका मुकावला मुगलों के बाए भाग के नेता गाजी खान बदख्शी से हुआ था।भयंकर युद्ध हुआ और राजपूतों के प्रवाल पराक्रम के सामने गाजी खान रणक्षेत्र छोड़ कर भाग गया।इस युद्ध के प्रत्यक्षदरसी और अकबर की और से लड़ने वाले मुल्ला अब्दुल कादर बदायुनी ने रामशाह के इस पराक्रम के विषय में लिखा है "ग्वालियर के राजा मानसिंह के पोते राजा रामशाह जो हमेशा राणा प्रताप की हरावल में रहता था उसने युद्ध में ऐसी वीरता दिखलायी क़ि लेखनी की शक्ति के बाहर है।राणा प्रताप,राजा रामशाह और हाकिम खान सूर की मार से मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई इस प्रकार युद्ध का प्रथम अध्याय महाराणा की आंशिक विजय के साथ समाप्त हुआ।बाद में घाटी से हटता -हटता संग्राम का केंद्र बनास के किनारे उस स्थल पर आ गया जो अब "रक्तताल"कहा जाता है।यहां भयंकर युद्ध हुआ और रणक्षेत्र खून से लथपथ हो गया।इस लिए इस स्थान का नाम युद्ध के बाद"रक्ताल "पड़ा।इसी रक्ताल में मेवाड़ की सुवतंत्रता की रक्षा के निमित 'प्रताप के स्वाभिमान और आन की खातिर धराशाही हुआ विक्रमादित्य का बेटा राजा राम शाह तोमर और अपने वीर पिता कीबलिदानी परम्पराओं का पालन किया वीरपुत्रों और राजपूतों के बलिदान की धारा को आगे बढाते हुए रामशाह के तीनों पुत्र शालिवाहन 'भवानी सिंह और प्रताप सिंह और पौत्र बलभद्र यही बलिदान हुये और उनका साथ दिया चंवल क्षेत्र के सैकड़ों वीर साहसी राजपूतों ने जो युद्ध में भाग लेने यहां से गये थे।कैसा दिल दहला देने वाला क्षण रहा होगा जब पिता का बलिदान पुत्रों के सामने हुआ और भाई का बलिदान भाई के सामनेहुआ हो।इस देश के लिए राजपूतों दुआरा किये बलिदानों की श्रंखला में इस बलिदान की कोई मिसाल नही मिल सकती।हल्दीघाटी मेंराजा रामशाह एबं उनके तीन पुत्रों एवंम एक पौत्र का बलिदान अर्थात एक ही दिन 'एक ही स्थान पर 'एक ही युद्ध में एक ही वंश व् एक ही परिवार की 3 पीढ़ी एक दूसरे के सामने बलिदान हो गई।बलिदानों की श्रंखला में इसे देश एवंम मातृभूमी के लिए सर्वश्रेष्ठ बलिदान कहा जा सकता है।एक महान बलिदानी और स्वतंत्रता सेनानी को इतिहासकारों'चारणों और भाटों ने वह प्रशस्ति और महत्व नही दिया जो दिया जाना चाहिए था।जिस प्रकार राणा प्रताप चित्तौड़ को विजित करने की आस मन में लिए स्वर्ग सिधार गये 'ठीक उसी प्रकार राजा रामशाह तोमर भी ग्वालियर की आस मन में लिए सैकड़ों मील दूर सारा जीवन स्वतंत्रता 'स्वाभिमान 'आन -बाण और शान ,मान मर्यादा के साथ संघर्ष रत रहकर अपनी अमर कीर्ति छोड़कर उस दिव्य ज्योति में विलीन हो गये।उन्होंने अपना राजपूती धर्म पूर्ण निष्ठा और साहस के साथ निभाया।ऐसे साहसी वीर योद्धा को मैं सत् सत् नमन करता हूँ।
जय हिन्द।
जय राजपूताना।

डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन गांव लरहोता सासनी जिला हाथरस उत्तर प्रदेश।

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