मंगलवार, 24 मार्च 2015

आन-बान-शान : धर्म की रक्षा

   हमारे देश का इतिहास आदिकाल से गौरवमय रहा है,क्षत्रिओं की आन बान शान की रक्षा केवल वीर पुरुषों ने ही नही की बल्कि हमारे देश की वीरांगनायें भी किसी से पीछे नही रहीं। आज से लगभग एक हजार साल पुरानी बात है,गुजरात में जयसिंह सिद्धराज नामक राजा राज्य करता था,जो सोलंकी राजा था,उसकी राजधानी पाटन थी,सोलंकी राजाओं ने लगभग तीन सौ साल गुजरात में शासन किया,सोलंकियों का यह युग गुजरात राज्य का स्वर्णयुग कहलाया। दुख की यह बात है,कि सिद्धराज अपुत्र था,वह अपने चचेरे भाई के नाती को बहुत प्यार करता था। लेकिन एक जैन मुनि हेमचन्द ने यह भविष्यवाणी की थी,कि राजा सिद्धराज जयसिंह के बाद यह नाती कुमारपाल इस राज्य का शासक बनेगा। जब यहबात राजा सिद्धराज जयसिंह को पता लगी तो वह कुमारपाल से घृणा करने लगा। और उसे मरवाने की विभिन्न युक्तियां प्रयोग मे लाने लगा। परन्तु क्मारपाल सोलंकी बनावटी भेष में अपनी जीवन रक्षा के लिये घूमता रहा। और अन्त में जैन मुनि की बात सत्य हुयी। कुमारपाल सोलंकी पचपन वर्ष की अवस्था में पाटन की गद्दी पर आसीन हुआ।
राजा कुमारपाल बहुत शक्तिशाली निकला,उसने अच्छे अच्छे राजाओं को धूल चटा दी,अपने बहनोई अणोंराज चौहान की भी जीभ काटने का आदेश दे दिया। लेकिन उसके गुरु ने उसकी रक्षा की। कुमारपालक जैन धर्म का पालक था,और अपने द्वारा मुनियों की रक्षा करता था। वह सोमनाथ का पुजारी भी था। राज्य के गुरु हेमचन्द थे,और महामन्त्री उदय मेहता थे,यह मानने वाली बात है कि जिस राज्य के गुरु जैन और मन्त्री जैन हों,वहां का जैन समुदाय सबसे अधिक फ़ायदा लेने वाला ही होगा।
राजाकुमारपाल तेजस्वी ढीठ व दूरदर्शी राजा था,उसने अपने प्राप्त राज्य को क्षीण नही होने दिया,राजा ने मेवाड चित्तौण को भी लूटा था,६५ साल की उम्र मे राजा कुमारपाल ने चित्तौड के राजा सिसौदिया से शादी के लिये लडकी मांगी थी,और सिसौदिया राजा ने अपनी कमजोरी के कारण लडकी देना मान भी लिया था। राजा ने यह भी शर्त मनवा ली थी कि वह खुद शादी करने नही जायेगा,बल्कि उसकी फ़ेंटा और कटारी ही शादी करने जायेगी। मेवाड के राजाओं ने भी यह बात मानली थी। एक भांड फ़ेंटा और कटारी लेकर चित्तौण पहुंचा, राजकुमार सिसौदिनी से शादी होनी थी। राजकुमारी ने भी अपनी शर्त शादी के समय की कि वह शादी तो करेगी,लेकिन राजमहल में जाने से पहले जैन मुनि की चरण वंदना नही करेगी। उसने कहा कि वह एकलिंग जी को अपना इष्ट मानती है। उसके मां बाप ने यह हठ करने से मना किया लेकिन वह राजकुमारी नही मानी।
रानी ने कुमारपाल की कटारी और फ़ेंटा के साथ शादी की और उस भाट के साथ पाटन के लिये चल दी। मन्जिलें तय होती गयीं और रानी सिसौदिनी की सुहाग की पूरक फ़ेंटा कटारी भी साथ साथ चलती गयी। सुबह से शाम हुयी और शाम से सुबह हुयी इसी तरह से तीन सौ मील का सफ़र तय हुआ और रानी पाटन के किले के सामने पहुंच गयी। राजा कुमारपाल के पास सन्देशा गया कि उसकी शादी हो कर आयी है और रानी राजमहल के दरवाजे पर है,उसका इन्तजार कर रही है। राजा कुमारपाल ने आदेश दिया कि रानी को पहले जैन मुनि की चरण वंदना को ले जाया जाये,यह सन्देशा रानी सिसौदिनी के पास भी पहुंचा,रानी ने भाट को जो रानी की शादी के लिये फ़ेंटा कटारी लेकर गया था,से सन्देशा राजा कुमारपाल को पहुंचाया कि वह एक लिंग जी की सेवा करती है और उन्ही को अपना इष्ट मानती है एक इष्ट के मानते हुये वह किसी प्रकार से भी अन्य धर्म के इष्ट को नही मान सकती है। यही शर्त उसने सबसे पहले भाट से भी रखी थी। राजा कुमारपाल ने भाट को यह कहते हुये नकार दिया कि राजा के आदेश के आगे भाट की क्या बिसात है,रानी को जैन मुनि को के पास चरण वंदना के लिये जाना ही पडेगा। रानी के पास आदेश आया और वह अपने वचन के अनुसार कहने लगी कि उसे फ़ांसी दे दी जावे,उसका सिर काट लिया जाये उसे जहर दे दिया जाये,लेकिन वह जैन मुनि के पास चरणवंदना के लिये नही जायेगी। भाट ने भी रानी का साथ दिया और रानी का वचन राजा कुमारपाल के छोटे भाई अजयपाल को बताया,राजा अजयपाल ने रानी की सहायता के लिये एक सौ सैनिकों की टुकडी लेकर और अपने बेटे को रानी को चित्तौड तक पहुंचाने के लिये भेजा। राजा कुमारपाल को पता लगा तो उसने अपनी फ़ौज को रानी को वापस करने के लिये और गद्दारों को मारने के लिये भेजा,राजा अजयपाल की टुकडी को और उसके बेटे सहित रानी को कुमारपाल की फ़ौज ने थोडी ही दूर पर घेर लिया,रानी ने देखा कि अजयपाल की वह छोटी सी टुकडी और उसका पुत्र राजा कुमारपाल की सेना से मारा जायेगा,वह जाकर दोनो सेनाओं के बीच में खडी हो गयी और कहा कि उसके इष्ट के आगे कोई खून खराबा नही करे,वह एकलिंग जी को मानती है और उसे कोई उनकी आराधना करने से मना नही कर सकता है,अगर दोनो सेनायें उसके इष्ट के लिये खून खराबा करेंगी तो वह अपनी जान दे देगी,राजा कुमारपाल और राजा अजयपाल कापुत्र यह सब देख रहा था,रानी सिसौदिनी ने अपनी तलवार को अपनी म्यान से निकाला और चूमा तथा अपने कंठ पर घुमा ली,रानी का सिर विहीन धड जमीन पर गिरपडा। कुमारपाल और अजयपाल की सेना देखती रह गयी,रानी का शव पाटन लाया गया। रानी के शव को चन्दन की चिता पर लिटाया गया,और उसी भाट ने जो रानी को फ़ेंटा कटारी लेकर शादी करने गया था ने रानी की चिता को अग्नि दी। अग्नि देकर वह भाट जय एक लिंग कहते हुये उसी चिता में कूद गया,उसके कूदने के साथ दो सौ भाट जय एकलिंग कहते हुये चिता में कूद गये,और अपनी अपनी आहुति आन बान और शान के लिये दे दी। आज भी गुजरात में राजा कुमारपाल सोलंकी का नाम घृणा और नफ़रत से लिया जाता है तथा रानी सिसौदिनी का किस्सा बडी ही आन बान शान से लिया जाता है। हर साल रानी सिसौदिनी के नाम से मेला भरता है,और अपनी पारिवारिक मर्यादा की रक्षा के लिये आज भी वहां पर भाट और राजपूतों का समागम होता है। यह आन बान शान की कहानी भी अपने मे एक है लेकिन समय के झकोरों ने इसे पता नही कहां विलुप्त कर दिया है.

रविवार, 22 मार्च 2015

अमर शहीद मेजर शैतानसिंह

१८ नवम्बर १९६२ की सुबह अभी हुई ही नहीं थी, सर्द
मौसम में सूर्यदेव अंगडाई लेकर सो रहे थे अभी बिस्तर से
बाहर निकलने का उनका मन ही नहीं कर रहा था,
रात से ही वहां बर्फ गिर रही थी। हाड़ कंपा देने
वाली ठण्ड के साथ ऐसी ठंडी बर्फीली हवा चल
रही थी जो इंसान के शरीर से आर-पार हो जाये और
इसी मौसम में जहाँ इंसान बिना छत और गर्म कपड़ों के
एक पल भी नहीं ठहर सकता, उसी मौसम में समुद्र तल से
१६४०४ फुट ऊँचे चुशूल क्षेत्र के रेजांगला दर्रे की ऊँची
बर्फीली पहाड़ियों पर आसमान के नीचे, सिर पर
बिना किसी छत और काम चलाऊ गर्म कपड़े और जूते
पहने सर्द हवाओं व गिरती बर्फ के बीच हाथों में
हथियार लिये ठिठुरते हुए भारतीय सेना की १३ वीं
कुमाऊं रेजीमेंट की सी कम्पनी के १२० जवान अपने
सेनानायक मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में बिना
नींद की एक झपकी लिये भारत माता की रक्षार्थ
तैनात थे।
एक और खुली और ऊँची पहाड़ी पर चलने वाली
तीक्ष्ण बर्फीली हवाएं जरुरत से कम कपड़ों को भेदते
हुये जवानों के शरीर में घुस पुरा शरीर ठंडा करने की
कोशिशों में जुटी थी वहीँ भारत माता को चीनी
दुश्मन से बचाने की भावना उस कड़कड़ाती ठंड में उनके
दिल में शोले भड़काकर उन्हें गर्म रखने में कामयाब हो
रही थी। यह देशभक्ति की वह उच्च भावना ही थी
जो इन कड़ाके की बर्फीली सर्दी में भी जवानों
को सजग और सतर्क बनाये हुये थी।
अभी दिन उगा भी नहीं था और रात के धुंधलके और
गिरती बर्फ में जवानों ने देखा कि कई सारी
रौशनीयां उनकी और बढ़ रही है चूँकि उस वक्त देश का
दुश्मन चीन दोस्ती की आड़ में पीठ पर छुरा घोंप कर
युद्ध की रणभेरी बजा चूका था, सो जवानों ने
अपनी बंदूकों की नाल उनकी तरफ आती रोशनियों
की और खोल दी। पर थोड़ी ही देर में मेजर शैतान
सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उनके सैनिक जिन्हें
दुश्मन समझ मार रहे है दरअसल वे चीनी सैनिक नहीं
बल्कि गले में लालटेन लटकाये उनकी और बढ़ रहे याक है
और उनके सैनिक चीनी सैनिकों के भरोसे उन्हें मारकर
अपना गोला-बारूद फालतू ही खत्म कर रहे है।
दरअसल चीनी सेना के पास खुफिया जानकारी थी
कि रेजांगला पर उपस्थित भारतीय सैनिक टुकड़ी में
सिर्फ १२० जवान है और उनके पास ३००-४०० राउंड
गोलियां और महज १००० हथगोले है अतः अँधेरे और
खराब मौसम का फायदा उठाते हुए चीनी सेना ने
याक जानवरों के गले में लालटेन बांध उनकी और भेज
दिया ताकि भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद
खत्म हो जाये। जब भारतीय जवानों ने याक पर
फायरिंग बंद कर दी तब चीन ने अपने २००० सैनिकों
को रणनीति के तहत कई चरणों में हमले के लिए रणक्षेत्र
में उतारा।
मेजर शैतान सिंह ने वायरलेस पर स्थिति की
जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को देते हुये समय
पर सहायता मांगी पर उच्चाधिकारियों से जबाब
मिला कि वे सहायता पहुँचाने में असमर्थ है आपकी
टुकड़ी के थोड़े से सैनिक चीनियों की बड़ी सेना को
रोकने में असमर्थ रहेंगे अतः आप चैकी छोड़ पीछे हट
जायें और अपने साथी सैनिकों के प्राण बचायें।
उच्चाधिकारियों का आदेश सुनते ही मेजर शैतान
सिंह के मस्तिष्क में कई विचार उमड़ने घुमड़ने लगे। वे
सोचने कि उनके जिस वंश को उतर भड़ किंवाड़ की
संज्ञा सिर्फ इसलिये दी गई कि भारत पर भूमार्ग से
होने वाले हमलों का सबसे पहले मुकाबला जैसलमेर के
भाटियों ने किया, आज फिर भारत पर हमला हो
रहा है और उसका मुकाबला करने को उसी भाटी वंश
के मेजर शैतान सिंह को मौका मिला है तो वह बिना
मुकाबला किये पीछे हट अपने कुल की परम्परा को कैसे
लजा सकता है?
और उतर भड़ किंवाड़ कहावत को चरितार्थ करने का
निर्णय कर उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर पूरी
स्थिति साफ साफ बताते हुये कहा कि - मुझे पता है
हमने चीनियों का मुकाबला किया तो हमारे पास
गोला बारूद कम पड़ जायेगा और पीछे से भी हमें कोई
सहायता नहीं मिल सकती, ऐसे में हमें हर हाल में
शहादत देनी पड़ेगी और हम में से कोई नहीं बचेगा। चूँकि
उच्चाधिकारियों का पीछे हटने हेतु आदेश है अतः आप
में से जिस किसी को भी अपने प्राण बचाने है वह
पीछे हटने को स्वतंत्र है पर चूँकि मैंने कृष्ण के महान युदुवंश
में जन्म लिया है और मेरे पुरखों ने सर्वदा ही भारत
भूमि पर आक्रमण करने वालों से सबसे पहले लोहा
लिया है, आज उसी परम्परा को निभाने का अवसर
मुझे मिला है अतः मैं चीनी सेना का प्राण रहते दम
तक मुकाबला करूँगा. यह मेरा दृढ निर्णय है।
अपने सेनानायक के दृढ निर्णय के बारे में जानकार उस
सैन्य टुकड़ी के हर सैनिक ने निश्चय कर लिया कि उनके
शरीर में प्राण रहने तक वे मातृभूमि के लिये लड़ेंगे चाहे
पीछे से उन्हें सहायता मिले या ना मिले. गोलियों
की कमी पूरी करने के लिये निर्णय लिया गया कि
एक भी गोली दुश्मन को मारे बिना खाली ना
जाये और दुश्मन के मरने के बाद उसके हथियार छीन
प्रयोग कर गोला-बारूद की कमी पूरी की जाय।
और यही रणनीति अपना भारत माँ के गिनती के सपूत,
२००० चीनी सैनिकों से भीड़ गये, चीनी सेना की
तोपों व मोर्टारों के भयंकर आक्रमण के बावजूद हर
सैनिक अपने प्राणों की आखिरी सांस तक एक एक
सैनिक दस दस, बीस बीस दुश्मनों को मार कर शहीद
होता रहा और आखिर में मेजर शैतान सिंह सहित कुछ
व्यक्ति बुरी तरह घायलावस्था में जीवित बचे, बुरी
तरह घायल हुए अपने मेजर को दो सैनिकों ने किसी
तरह उठाकर एक बर्फीली चट्टान की आड़ में पहुँचाया
और चिकित्सा के लिए नीचे चलने का आग्रह किया,
ताकि अपने नायक को बचा सके किन्तु रणबांकुरे मेजर
शैतान सिंह ने इनकार कर दिया। और अपने दोनों
सैनिकों को कहा कि उन्हें चट्टान के सहारे बिठाकर
लाईट मशीनगन दुश्मन की और तैनात कर दे और गन के
ट्रेगर को रस्सी के सहारे उनके एक पैर से बाँध दे ताकि
वे एक पैर से गन को घुमाकर निशाना लगा सके और दुसरे
घायल पैर से रस्सी के सहारे फायर कर सके क्योंकि
मेजर के दोनों हाथ हमले में बुरी तरह से जख्मी हो गए थे
उनके पेट में गोलियां लगने से खून बह रहा था जिस पर
कपड़ा बाँध मेजर ने पोजीशन ली व उन दोनों
जवानों को उनकी इच्छा के विपरीत पीछे जाकर
उच्चाधिकारियों को सूचना देने को बाध्य कर भेज
दिया।
सैनिकों को भेज बुरी तरह से जख्मी मेजर चीनी
सैनिकों से कब तक लड़ते रहे, कितनी देर लड़ते रहे और कब
उनके प्राण शरीर छोड़ स्वर्ग को प्रस्थान कर गये
किसी को नहीं पता. हाँ युद्ध के तीन महीनों बाद
उनके परिजनों के आग्रह और बर्फ पिघलने के बाद सेना के
जवान रेडक्रोस सोसायटी के साथ उनके शव की
तलाश में जुटे और गडरियों की सुचना पर जब उस
चट्टान के पास पहुंचे तब भी मेजर शैतान सिंह की लाश
अपनी एल.एम.जी गन के साथ पोजीशन लिये वैसे ही
मिली जैसे मरने के बाद भी वे दुश्मन के दांत खट्टे करने
को तैनात है।
मेजर के शव के साथ ही उनकी टुकड़ी के शहीद हुए ११४
सैनिकों के शव भी अपने अपने हाथों में बंदूक व हथगोले
लिये पड़े थे, लग रहा था जैसे अब भी वे उठकर दुश्मन से
लोहा लेने को तैयार है।
इस युद्ध में मेजर द्वारा भेजे गये दोनों संदेशवाहकों
द्वारा बताई गई घटना पर सरकार ने तब भरोसा
किया और शव खोजने को तैयार हुई जब चीनी सेना
ने अपनी एक विज्ञप्ति में कबुल किया कि उसे सबसे
ज्यादा जनहानि रेजांगला दर्रे पर हुई। मेजर शैतान
सिंह की १२० सैनिकों वाली छोटी सी सैन्य टुकड़ी
को मौत के घाट उतारने हेतु चीनी सेना को अपने
२००० सैनिकों में से १८०० सैनिकों की बलि देनी
पड़ी। कहा जाता है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए
भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को
देख चीनी सैनिकों ने जाते समय सम्मान के रूप में
जमीन पर अपनी राइफलें उल्टी गाडने के बाद उन पर
अपनी टोपियां रख दी थी। इस तरह भारतीय
सैनिकों को शत्रु सैनिकों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त
हुआ था। शवों की बरामदगी के बाद उनका
यथास्थान पर सैन्य सम्मान के साथ दाहसंस्कार कर
मेजर शैतान सिंह भाटी को अपने इस अदम्य साहस और
अप्रत्याशित वीरता के लिये भारत सरकार ने सेना के
सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।
जैसलमेर का प्राचीनतम इतिहास भाटी शूरवीरों
की रण गाथाओं से भरा पड़ा है। जहाँ पर वीर अपने
प्राणों की बाजी लगा कर भी रण क्षेत्र में जूझते हुए
डटे रहते थे। मेजर शेतान सिंह की गौरव गाथा से भी
उसी रणबंकुरी परम्परा की याद ताजा हो जाती
है। स्वर्गीय आयुवान सिंह ने परमवीर मेजर शैतान सिंह
के वीरोचित आदर्श पर दो शब्द श्रद्धा सुमन के सद्रश
लिपि बद्ध किये है। कितने सार्थक है:---
रजवट रोतू सेहरो भारत हन्दो भाण
दटीओ पण हटियो नहीं रंग भाटी सेताण
जैसलमेर जिले के बंसार (बनासर) गांव के ले.कर्नल
हेमसिंह भाटी के घर १ दिसम्बर १९२४ को जन्में इस
रणबांकुरे ने मारवाड़ राज्य की प्रख्यात शिक्षण
संस्था चैपासनी स्कुल से शिक्षा ग्रहण कर एक अगस्त
1949 को कुमाऊं रेजीमेंट में सैकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में
नियुक्ति प्राप्त कर भारत माता की सेवा में अपने
आपको प्रस्तुत कर दिया था। मेजर शैतान सिंह के
पिता कर्नल हेमसिंह भी अपनी रोबीली कमांडिंग
आवाज, किसी भी तरह के घोड़े को काबू करने और
सटीक निशानेबाजी के लिये प्रख्यात थे।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

हठ्ठी हमीर का हठ

  भाग्य और पुरुषार्थ में विवाद उठ खड़ा हुवा उसने कहा में बड़ा दुसरे ने कहा में बड़ा | विवाद ने उग्र रूप धारण कर लिया,यश ने मध्यस्था स्वीकार कर निर्णय देने का वचन दिया दोनों को यश ने आज्ञा दी कि तुम मृत्यु लोक में जावो | दोनों ने बाहें तो चढा ली पर पूछा 'महाराज हम दोनों एक ही जगह जाना चाहते है पर जायें कहाँ ? हमें तो ऐसा कोई दिखाई नही देता ' यश कि आँखे संसार को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हमीर पर आकर ठहर गई |
वह हठ की चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |
एक मंगलमय पुन्य प्रभात में हठ कि यहाँ शरणागत वत्सलता ने पुत्री के रूप में जन्म लिया,वह वैभव के मादक हिंडोली में झूलती,आँगन में घुटनों के बल गह्कती,कटि किंकन के घुन्घुरुओ कि रिमझिम के साथ बाल सुलभ मुक्त हास्य के खजाने लुटातीएक दिन सयानी हो गई | स्वयंबर में पिता ने घोषणा कि 'इस अनिन्ध्य सुंदरी को पत्नी बनाने वाले को अपना सब कुछ देना पड़ता है यही इसकी कीमत है |'
वह त्याग कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |
त्याग कि परीक्षा आई सोलह श्रंगार से विभूषित,कुलीनता के परिधान धारण कर गंगा कि गति से चलती हुयी शरणागत वत्सलता सुहाग रात्रि के कक्ष में हमीर के समक्ष उपस्थित हुयी -
नाथ ! में में आपकी शरण में हु परन्तु मेरे साथ मेरा सहोदर दुर्भाग्य भी बाहर खड़ा है ,क्या फ़िर भी आप मुझे सनाथ करेंगे ?
वह भाग्य कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |

अलाउद्दीन कि फौज का घेरा लगा हुवा था बीच में हमीर कि अटल आन का परिचायक रणथम्भोर का दुर्ग सिर ऊँचा किए इस प्रकार खड़ा था जेसे प्रलय से पूर्व तांडव मुद्रा में भगवान शिव तीसरा नेत्र खोलने के समय कि प्रतीक्षा कर रहें हों,मीरगमरू और मम्मुश कह रहे थे -,इन अदने सिपाहियों के लिया इतना त्याग राजन ! हमारी शरण का मतलब जानते हो ?हजारों वीरों कि जीवन कथाओं का उपसंहार,हजारों ललनाओ कि अतृप्त आकाँक्षाओं का बाल पूर्वक अपहरण,हजारों निर्दोष मानव कलिकाओं को डालियों से तोड़ कर,मसल कर आग में फेंक देना,इन रंगीले महलों के सुनहले यौवन पर अकाल मृत्यु के भीषण अवसाद को डालना |'
वह परिणाम कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |'
भोज्य सामग्री ने कहा -" में किले में नही रहना चाहती,मुझे विदा करो |"
वह भूख मरी की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |
रणचंडी ने कहा - "में राजपूतों और तुम्हारा बलिदान चाहती हूँ ,इस चहकते हुए आबाद किले को बर्बाद कर प्रलय का मरघट बनाना चाहती हूँ |"
वह मर्त्यु की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
शाका ने आकर कहा केसरियां वस्त्र की भेंट दी और कहा ' मुझे पिछले कई वर्षों से बाँके सिपाहियों का साक्षात्कार का अवसर नही मिला | मै जिन्दा रहूँगा तब तक पता नही वे रहेंगे या नही |'
वह शोर्य की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
हमीर के हाथो में लोहा बजने लगा अन्तर की प्यास को हाथ पिने लगे | उसके पुरुषार्थ का पानी तलवार में चढ़ने लगा खून की बाढ़ आ गई और उसमे अलाउद्दीन की सेना डूब गई मानवता की सरल -हृदया शान्ति ने हमीर की तलवार पकड़ ली और फ़िर उसे छोड़कर चरणों में गिर पड़ी |
वह विजय की चुनौती थी
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |'
अप्रत्याशित विजय पर हमीर के सिपाही शत्रु सेना के झंडे उछालते,घोडे कुदाते,रणथम्भोर के किले की तरफ जा रहे थे | दुर्भाग्य ने हाथ जोड़कर रह रोक ली - " हे नृप श्रेष्ठ ! मै जन्म जन्म का अभागा हूँ जिस पर प्रसन्न होता हूँ उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है में जनता हूँ मेरी शुभकामनायों का परिणाम क्या हुवा करता है परन्तु आप जेसे निस्वार्थी और परोपकारी क्षत्रिय के समक्ष न झुकाना भी कृतध्नता है | आप जेसे पुरुषार्थी मेरा सिर भी फोड़ सकते है,फ़िर भी मेरा अन्तः करण आपकी प्रसंशा के लिए व्याकुल है | क्या में आपकी प्रसंशा प्रकट करूँ ?
वह विधाता की चुनौती थी |
हमीर ने कहा - स्वीकार है |
शत्रु पक्ष के झंडों को उछलते देख दुर्ग के प्रहरी ने परिणाम का अनुमान लगा लिया,बारूद के ढ़ेरी में भगवान का नाम लेकर बती लगादी गई आँख के पलक एक झपके के साथ धरती का पेट फुट गया | चहचहाती जवान जिंदगियां मनहूस मौत में बदल गई | हजारों वीरांगनाओं का अनूठा सोंदर्य जल कर विकराल कुरूपता से एंठ गया, मंद मंद और मंथर मंथर झोंकों द्वारा बीलोडित पालनों में कोलाहल का अबोध शिशु क्षण भर में ही नीरवता का शव बन चुका था |गति और किलोले करते खगव्रन्द ने चहचहाना बंद कर अवसाद में कुरलाना शुरू कर दिया जिंदगी की जुदाई में आकाश रोने लगा | सोती हुयी पराजय मुंह से चादर हटाकर खड़ी हो गई कुमकुम का थाल लेकर हमीर के स्वागत के लिए द्वार पर आई - "प्रभु ! मेरी सौत विजय को तो कोई भी स्वीकार कर सकता है परन्तु मेरे महलो में आप ही दीपक जला सकते है |"
वह साहस की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है|"
हमीर ने देखा,कारवां गुजर चुका है और उसकी खेह भी मिटने को है , बगीचे मुरझा गए है और खुसबू भटक रही है | जीवन के अरमान मिटटी में धूमिल पड़ गए है और उनकी मनोहर स्मर्तियाँ किसी वैरागी की ठोकर की प्रतीक्षा कर रही है,म्रत्यु ने आकर कहा -नर श्रेष्ठ ! अब मेरी ही गोद तुम्हारे लिए खाली है |
वह निर्भीकता की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
महाकाल के मन्दिर में हमीर ने हाथों अपना अनमोल मस्तक काट कर चढा दिया | पुजारी का लौकिक जीवन समाप्त हो गया |परन्तु उसके यश्वी हठ द्वारा स्थापित अलौकिक प्रतिष्ठा ने इतिहास से पूछा -"क्या ऐसा कोई हुवा है ? " फ़िर उसने लुटे हुए वर्तमान की गोदी में खेलते हुए भविष्य से भी पूछा -"क्या ऐसा भी कोई होगा ? प्रश्न अब भी जिघासु है और उत्तर निरुत्तर | रणथम्भोर लुटी हुयी कहानी का सुहाग अभी तक लौट कर नही आया, उसका वैधव्य बीते दिनों की याद में आंसू बहा रहा है |
यह शरणागत वत्सलता की चुनौती है |
परन्तु इस चुनौती को कोंन स्वीकार करे ? हमीर की आत्मा स्वर्ग पहुँच गई,फ़िर भी गवाक्षों में लौट कर आज भी कहती है -"स्वीकार है |"
यश पुरुषार्थ की तरफ हो गया | भाग्य का मुंह उतर गया | नई पीढी आज भी पूछती है -
"सिंह गमन सत्पुरुष वचन,कदली फ़लै इक बार |
तिरया तेल हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार ||
जिसके लिए यह दोहा कहा गया वह रणथम्भोर का हठीला कौन था ? तब अतीत के पन्ने फड फड़ा कर उतर देतें है -"वह भी एक क्षत्रिय था |"
चित्रपट चल रहा था द्रश्य बदलते जा रहे थे |