गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

रावत चूण्डा जी

1395 ई. में मेवाड़ के महाराणा लाखा की महारानी लखमादे चौहान [खिंची] से एक पुत्र हुआ जिसका नाम चूण्डा रखा गया l चूण्डा बचपन से ही पिता का विशेष आदर करता था और इसीलिए लोग उसे पितृ भक्त युवराज चूण्डा कहने लगे l एक दिन की बात है जब चूण्डा और उसके पिता महाराणा लाखा चित्तोड़ में किले की छत पर खड़े खड़े बाते कर रहे थे तभी अचानक वहां से एक बारात निकली जिसे देख कर महाराणा ने चर्चा से भंग होते हुए एक ठंडी श्वश ली जिसे देखते ही चूण्डा को लगा की उसके पिता की विवाह की इच्छा हुए है तथा वह अभी भी संसार में आसक्त है l चूण्डा अपने पिता की हर इच्छा पूरी करना चाहता था, किन्तु इस विषय में लाज के कारण वह खुल कर नहीं कह सका lकुछ दिनों बाद मेवाड़ में मारवाड़- मंडोवर से चूण्डा के लिए राव रणमल अपनी बहन हंसा बाईजी कुंवर का रिश्ता ले कर दरबार में आया और नारियल नज़र किया और कहा '' ये आपके कुंवर चूण्डा के लिए मेरी बहन का रिश्ता कुबूल करने की कृपा बक्षावे '' राव रणमल जो अपने पिता की नाराजगी के कारन मेवाड़ में रह रहा था और दरबार में अपनी प्रतिष्ठा पाने क लिए अग्रसर था, इसी बहाने से यह रिश्ता युवराज चूण्डा के लिए लाया था l रणमल की यह बात सुनकर महाराणा ने दरबार में मजाक में कह दिया '' हाँ भाई हमें पता है यह रिश्ता हमारे कुंवर के लिए ही होगा, हमारे लिए थोड़ी होगा, भाई हम तो अब बूढ़े हो चले हैं l’’ जिस क्षण महाराणा ने यह वचन कहे देव योग से युवराज चूण्डा वहां आ गए और यह वचन सुनकर तुरंत पिता की इच्छा भांपते हुए उन्होंने शादी से इंकार कर दिया और वह से आज्ञा ले कर चल दिए lउसी रात चूण्डा ने रणमल को यह सन्देश भिजवाया के आपने अब तक हमे एक बार भी गोठ पर नहीं बुलाया, हम अब तक उस दिन का इन्तेजार कर रहे हैं क्यूंकि हमे आपसे कुछ ज़रूरी बातें करनी है l राव रणमल जो इस बात से हैरान था, तुरंत तय्यारी में तत्पर हुआ l भोजन के दोरान जब वार्ता चली तो चूण्डा ने अरज करी के राव रणमल अपनी बहन का रिश्ता उनके पिता से कर दे l इसपर रणमल ने इंकार कर दिया l चूण्डा के बहुत समझाने पर भी जब रणमल नहीं माना तो चूण्डा ने पास खड़े रणमल के चांदन खिडिया चरण से कहा की वह अपने सरदार को समझाए l रणमल ने महाराणा की व्रध्हवस्ता को इंकार का कारन बताया जिसे चूण्डा ने तत्कालीन परम्पराओं का हवाला देते हुए नहीं माना l तब चतुर और चालक चारण बोला के राव साहब को हुजुर की उम्र से कोई तकलीफ नहीं है l किन्तु मेवाड़-राजपूताने के रिवाज़ के तहत महाराणा के बाद उनकी गद्दी का वारिस उनका छोटा पुत्र होगा सो हमारा भानेज एक साधारण ठाकुर बनकर रहेगा और छोटी से जागीर पा कर अपना गुजर बसर करेगा जो राव साहब को पसंद नहीं इसलिए इंकार कर रहे l यह उत्तर सुनकर चूण्डा ने तुरंत भीष्म प्रतिज्ञा करते हुए यह प्रण लिया के महाराणा के बाद उनकी गद्दी का वारिस उनसे उत्पन्न पुत्र ही होगा और चूण्डा उसकी सेवा में हमेशा छोटे भाई अथवा रक्षक की तरह आजीवन तत्पर रहेंगे lइसपर रणमल मान गया और अगले ही दिन महाराणा का हंसा कुमारी से विवाह हो गया l तेरह महीने बाद महारानी हंसा बाई के एक पुत्र हुआ जिसका नाम मोकल रखा गया l जब महाराणा की मृत्यु हुई तब रानी हंसा बाई सती होने को तत्पर हुई, और चूण्डा से पूछा की उसने मोकल के लिए कोन्सी जागीर लिखी है ?? तब प्रत्युतर में चूण्डा ने कहा के ''हे माता आपका पुत्र मेवाड़ का महाराणा है और मैं उसका सेवक हूँ , साथ ही आपको सति नहीं होना चाहिए आप तो मेवाड़ बाईजीराज अथवा राजमाता है आपको तो इनका ध्यान रखना चाहिए अभी इनकी आयु बहुत कम है l इस प्रकार चूण्डा ने महाराणा मोकल को मात्रहीन होने से बचाया l इसकारण से चूण्डा की मेवाड़ में बड़ी प्रशंसा होने लगी क्यूंकि कलियुग में ऐसा महान त्याग कौन राजपुत्र कर सकता था l चूण्डा ने न्याय पूर्ण शासन की स्थापना करी और प्रजा और मेवाड़ को मजबूत करने में पूरा ध्यान लगा दिया lचूण्डा के बड़ते प्रभाव से राठोड राव रणमल अपने को कमजोर समझ कर क्षुब्ध हो गया l अतः उसने हंसा बाई को चूण्डा के विरुद्ध भड़काते हुए कान भरने शुरू कर दिए और कहा की चूण्डा ने मोकल को गद्दी पर बिठा कर अपना वचन तो पूरण कर दिया है पैर वह मोकल को कभी भी गद्दी से निष्कासित कर खुद महाराणा बन सकता है इस बात का उसे संदेह है l नादाँ और अनुभवहीन महारानी हंसा बाई ने चूण्डा को बुला कर कहा की '' या तो तुम मेवाड़ छोड़ कर चले जाओ या फिर हमे बतला दो की हम कहाँ जाकर रहे l '' इस बात से चूण्डा को बड़ी ठेस लगी और चूण्डा ने तत्काल यह प्राण लिया की वह मेवाड़ छोड़ कर जा रहा है और तभी वापिस आयेगा जब महारानी हंसा खुद चूण्डा को आने की आग्या देंगी l महाराणा मोकल की रक्षा और राज्य का प्रबंध के लिए चूण्डा ने केलवाड़े से बुलाकर अपने छोटे भाई राघवदेव को सोंपी जो बड़ा बलवान और कुशल शासन करता था lचूण्डा मेवाड़ से निकल कर मांडू के सुल्तान होशंग शाह के पास जा रहा l मांडू मेवाड़ के करीब था, सो अवसर आने पर तुरंत चित्तोड़ आना सरल रहे l मांडू पहुचने पर सुल्तान होशंग शाह ने चूण्डा का बहुत आदर सत्कार किया और ''रावत'' की उपाधि से नवाजा l इसका कारन यह था की चूण्डा ने गद्दी त्यागने के पश्चात् खुद को युवराज कहलवाना मना करवा दिया था सो सुल्तान उन्हें रावत चूण्डा कहता था l उधर चूण्डा के मेवाड़ से जाते ही रणमल ने धीरे धीरे अपना प्रभाव मजबूत करना शुरू कर दिया l उसने मेवाड़ की सेना की सहायता से मंडोवर के असली शासक सत्ता को मार दिया और स्वयं शासन करने लगा इधर मेवाड़ में भी उसने अपने रिश्तेदारी का हवाला देते हुए बड़े बड़े पदों पर अपने राठोड सामंतो को बिठाने की पूरी कोशिश करी जिसमे राघवदेव की वजह से वह हर बार तो सफल नहीं हुआ किन्तु फिर भी उसने जबरदस्त प्रभाव बड़ा लिया lएक दिन महाराणा लाख के पिता महाराणा खेता के पास्वनिये पुत्र चाचा और मेरा ने किसी बात से नाराज़ होकर महाराणा मोकल की हत्या कर दी l इस बात को उचित अवसर जानकार रणमल ने तुरंत चित्तोड़ आ कर चाचा और मेरा को मार कर महाराणा की हत्या का बदला बतलाकर अपना प्रभाव फिर से बड़ा लिया l अब रणमल मेवाड़ और मारवाड़ दोनों जगह अपना शासन करने लगा l उसकी राह में अब सबसे बड़ा कांटा केवल वीर राघवदेव था जो नए महाराणा बालक कुम्भा की रक्षा और मेवाड़ में रह रहे राठोड सामंतो पर हर वक़्त नज़र रखता था और चूण्डा को हर खबर देता रहता था l राघवदेव ने हर तरफ चित्तोड़ के किले पर अपने विश्वस्त सिसोदिये सरदारों को लगा रखा था केवल बहरी जागीरो पर उसकी पकड़ कमजोर थी क्यूंकि जागीरें रणमल महारानी को बहला कर अपने राठोड सिपाहियों को दे रहा था l रणमल को उससे बड़ा भय था और उसको अकेले पकड़ना और काबू में करना मुश्किल था lइसीलिए रणमल ने एक योजना रची और छल से राघवदेव को मारने की ठानी l उसने अपने दो विश्वस्त राजपूतो को एक सुन्दर और बोहोत ही बेशकीमती कुरता जो की बहुमूल्य रत्नों हीरे जवाहरातो से जडित था राघवदेव के पास उपहार स्वरुप भिजवाया जिसके पीछे छुपे कपट से भोला भला राघवदेव अनभिज्ञ था l जब वह दोनों सरदार राघवदेव के पास पहुचे तो पहले तो राघवदेव को कुछ संदेह हुआ किन्तु फिर वह उनकी मीठी बातो में आ गया की वह रणमल को अपना मित्र ही समझे वह सबका भला चाहता है l इस बात से राघवदेव आश्वस्त हुआ और उनसे कहा की रणमल जी से कहना की मुझे उनका ये तोहफा बहुत पसंद आया और उनपर इसका उधर बाकि है जो वह भी कभी उतरेंगे ऐसी ही कोई वस्तु भेंट कर के l यह कहते हुए राघवदेव ने उन्हें सीख का रक्खा दिया और सकुशल जाने को कहा l किन्तु यह देख प्रत्युतर में उन राजपूतों ने कहा की हुकुम ने फ़रमाया है के यह कुरता आपको पहना हुआ देख कर ही वापस लौटना की उसका नाप सही है या नहीं l ऐसा कहने पर राघवदेव उनकी बातों में आ गया और उसने अपनी तलवार और क़टार दोनों कमर से निकल कर एक और राखी और उस कुरते को पहना l जैसे ही उसने कुरता पहना तो पाया की उसकी दोनों बाहें आगे से सिली हुई थी, इतने में ही जैसे ही उसने ऊपर देखा तो दोनों राजपूत अपनी तलवारें ताने खड़े थे और वीर रघवदेव पर वार पर वार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी l इस बात से रणमल को बड़ी रहत पोहोची और उसने महारानी हंसा बाई को यह कहते हुए समझा दिया की न जाने किसने उन्हें मारा होगा वह चिंता न करें वह खुद इसकी तहकीकात करेगा l उसने यह भी कहा की राघवदेव तेज़ मिजाज़ के थे तो जरुर उनकी किसी से शत्रुता हो गयी होगी l जब चूण्डा को इस बात की खबर मिली तो वह बोहोत क्रुद्ध हुआ किन्तु अपने वचन के आगे लाचार था l इस बात से दुखी हो कर उसने इस घटना को एकलिंगनाथ पर ही छोड़ दिया और प्रार्थना करने लगा के किसी भी तरह भोली राजमाता को अपने पिता के बुरे इरादों का पता चल जाये और वह पुनः मेवाड़ में प्रवेश कर रणमल से पुराने सारे घटनाक्रम का बदला लेवे lइसी प्रार्थना से एक दिन नशे में चूर राव रणमल ने गलती से अपनी दासी भारमली अपने गंतव्यों के बारे में कह सुनाया की वह महाराणा को अपने रस्ते से हटा कर एक दिन खुद चित्तोड़ का महाराज बनेगा और उसको अपनी रानी बना कर रखेगा l जब यह बात दासी ने सुनी तो वह शांत रही और झूटी मुस्कान बता कर वह से चल दी और तुरंत महारानी हंसा बाई को सारा व्रतांत कह सुनाया l इन सब बातो से महारानी को बड़ी दुःख हुआ पश्चाताप हुआ और इस बात का डर सताने लगा की यदि उसके पिता इन सब योजनाओं में सफल हो गए तो उसे अपने ससुराल के नाश का घोर पाप लगेगा जिसक लिए वह स्वयं को कभी माफ़ नहीं कर पायेगी ,यह सब सोचते हुए महांरानी हंसाबाई ने रावत चूण्डा को यह संदेसा भिजवा दिया की तुम्हारे पिता का राज्य छूट रहा है खबर मिलते हे पधारो और महाराणा की सेवा में रहकर राज्य करो और मेरे बर्ताव के लिए क्षमा करो l ऊँट सवार का यह संदेसा पते हे चूण्डा ने अपने आने का नियता समय बतला दिया और लिखा की जब तक वह नहीं आये महाराणा को किसी गुप्त और सुरक्षित स्थान पर भिजवा दे l कुछ ही दिनों पश्चात् तुरंत चूण्डा ससेन्य मेवाड़ में आ पहुंचा और बाकि सिसोदिया सरदारों और अजमल से मिला l अजमल जो की सत्ता का पुत्र था और मंडोवर का का असली हकदार था l सत्ता को रणमल ने मेवाड़ी सेना की मदद से परास्त कर मार दिया था इसी कारन अजमल उससे बदला लेना चाहता था l चूंडा के अजमल से मिलने और सारे सिसोदिया सरदारों को इकट्ठा करने से रणमल को कुछ शक होने लगा जिससे उसने जोधा और अपने परिवार को चित्तोड़ के किले की तलहटी में सुरक्षित पहुंचा दिया और अपने पहरेदारो को सावधान कर दिया l एक दिन महाराणा के आदेश पर दासी भारमली ने रणमल को खूब शराब पिलाई और उसे खाट से बांध दिया l फिर जब उसे कुछ होश न था तब बाहर सारे सिसोदियों ने झगडा शुरू कर दिया l चूण्डा और अजमल, जो की मंडोवर का असली वारिस था एक साथ थे ने मारकाट शुरू कर दी l इधर रणमल को खाट से बंधे हुए ही ३ हजुरियो ने जो की भारमली के सहयोगी थे उसी तरह धोके से मार दिया जैसे रणमल ने राघवदेव को मरवाया था l कहते है रणमल भी आखिर वीर योद्धा था , सो मरने से पहले पास रखे लोटे से २ आदमियों को मार कर खाट से उठ खड़ा हुआ था l जैसे ही रणमल मारा गया तभी किले के किसी ढोली ने यह दोहा कहा - चूण्डा अजमल आविया मांडू से धक् आग, जोधा रणमल मारिया भाग सके तो भाग l इसप्रकार मेवाड़ रणमल के जाल से आजाद हो चूका था चूण्डा ने चित्तोड़ आते हे सारा राज्य कार्य अपनी हाथो में संभाल लिया और फिर मेवाड़ में शांति कायम करी l चूण्डा ने मंडोवर पर कब्ज़ा कर लिया और सड़े सात वर्ष तक मारवाड़ पर मेवाड़ का कब्ज़ा रहा, जब महारानी हंसा बाई ने एक दिन महाराणा से अरज करी की मेरे चित्तोड़ ब्याहने से यहाँ का और मंडोवर का बोहोत नुकसान हुआ है लेकिन अब अगर सब तरफ शांति कायम हो जाये तो मुझे शांति होगी सो आप चूण्डा से कह कर मंडोवर से कब्ज़ा हटवाओ तो मुझे ख़ुशी होगी l महाराणा भी सबका भला चाहते थे सो चूण्डा को वापस आने का फरमान लिख भेजा l महाराणा का पत्र पाते हे चूण्डा मंडोवर अपने ३ बेटों कुंतल , मंजा और सुआ के हवाले छोड़ चित्तोड़ रवाना हुआ और पीछे ही जोधा ने मंडोवर पे हमला कर दिया जिसमे उसके तीनो पुत्र काम आये और मंडोवर पे जोधा का कब्ज़ा हो गया l जब चूण्डा चित्तोड़ आया तो महाराणा से मिलकर बड़ा दुखी हुआ, और जैसे हे मंडोवर की खबर मिली तो और ज्यादा क्रोद्धित हुआ और पुनः मंडोवर पे कब्ज़ा करने को तत्पर हुआ l लेकिन इसबार महाराणा ने जोधा और चूण्डा के बीच बैराठगड़ में संधि करवा दी और शांति स्थापित करी l जोधा ने अपनी सम्बन्धी पुत्री श्रृंगारदेवी का विवाह रायमल से करवाया जो महाराणा कुम्भा का पुत्र था l उधर जोधा भी पराक्रमी योद्धा हुआ और बाद में जब मेवाड़ - मारवाड़ संधि हुई, तो जोधपुर अपनी नयी राजधानी कायम करी और नए राज्य की नीव राखी l रावत चूण्डा के विषय में सभी लोगों में केवल यही धरना है के चूण्डाजी ने सिर्फ चित्तौड़ को राव रणमल से आज़ाद कराया और बाकि कोए एतिहासिक जानकारी नहीं मिलती l लेकिन यह एक बोहोत बड़े शोध का विषय है l1427 में महाराणा कुम्भा का जन्म हुआ जो 1433 में गद्दी पर बिराजे जब महाराणा मोकल की हत्या चाचा और मेरा ने की l 1438 में जब राव रणमल मारा गया था तब कुम्भा 11 वर्ष के हो चुके थे l ग्यारह वर्ष के राणा कुम्भा की नाबालिगी और चित्तौड़ में हुए ताज़ा उथल पथल के कारण गुजरात के सुल्तान अहमद शाह और मालवा के महमूद खिल्जी दोनों सुल्तानों ने 1440 चित्तौड़ पर हमला कर दिया जिसे मेवाड़ी फ़ौज ने हरा दिया इस संय्युक्त सेना को हराने की विजई-ख़ुशी में विजय स्तंभ का निर्माण 1442 - 1448 के बीच हुआ l विजय स्तंभ जब बनना शुरू हुआ था तब कुम्भा 15 वर्ष के थे और निर्माण पूरा होने तक भी कुम्भा महज अधिक से अधिक 21 के हो चोके थे l तो यह कहना की चूण्डा का इसमें कोई योगदान नहीं था बिलकुल तर्कहीन हे साबित होगा l चूँकि चूण्डा उस मेवाड़ के प्रधान थे और उन्ही के नेतृत्व में मेवाड़ में प्रशासन और राजपाठ चलता था क्यूंकि विजई स्तम्भ की शुरुवात के समय कुम्भा 15 वर्ष के थे सो निर्माण का विचार और उसे पूर्ण करने की जिम्मेदारी चूण्डाजी ने निभाई और अपना इससे महाराणा कुम्भा को समर्पित किया l चूण्डाजी ने अपनी स्वार्थ सिद्धि नहीं चाहते थे तभी संभवतः उन्होंने उसमे कहीं भी अपने नाम का उल्लेख नहीं करवाया l यही कारण था की उन्हें त्यागवीर भीष्म की उपमा से नवाजा गया lयुद्ध वीर रावत चूण्डा ने मांडू के सुल्तान महमूद खिल्जी द्वारा 1442 , 1443 , और 1446 तक लगातार और बार बार हुए आक्रमणों से चित्तौड़ को न केवल बचाया बल्कि बल्कि सुल्तान को बार बार हराया भी l सुल्तान यह जनता था की चित्तौड़ पर चूण्डा खुद कभी महाराणा नहीं बनेगा और वारिस महाराणा कुम्भा उम्र में छोटा है अगर चूण्डा और कुम्भा दोनों मारे जाएँ तो मेवाड़ पर कब्ज़ा हो सकता है lरावत चूण्डा ने गागरोन के खिंचियों को युद्ध में परास्त किया l 1443 में जब सुल्तान ने मेवाड़ में लूट और कब्ज़ा जमाया तब उसने गागरोन पर कब्ज़ा कर लिया था l गागरोन मेवाड़ और मालवा की सीमा के बीच में पढता था अतः खिंचियों ने सुल्तान के डर से मेवाड़ में मिलना मन कर दिया था इसी कारन चूण्डा को उनपे हमला करना पड़ा l चूण्डा ने टोडा के सगत सिंह सोलंकी को युद्ध में मारा lदूसरी ओर जब 1438 में रणमल के मरने पर जब कुम्भा केवल 11 वर्ष के बालक थे तब उनकी संभाल के साथ ही साथ 7 सात वर्ष तक मारवाड़ पर पूर्ण कब्ज़ा रखा और 1438 - 1453 तब मंडोर पर अपना कब्ज़ा रखा जब तक की खुद महाराणा कुम्भा ने बड़े हो कर एक दिन स्वयं मंडोर से सेना बुलाने का आदेश नहीं दिया l इसका कारण यह था की एक दिन राजमाता हंसा बाई ने कुम्भा से यह निवेदन किया की ''मेरे चित्तौड़ ब्याहने से मेरे कुल का बोहोत नाश हुआ है अब तो पिता रणमल भी नहीं रहे जबकि उन्होंने महाराणा मोकल के हत्यारे चाचा और मेरा का को मारा चित्तौड़ अब आज़ाद है फिर भी जोधा संघर्ष कर रहा है l तुम कहो तो सब और शांति हो सकती है और फिर हर तरफ सुल्तान के आक्रमण का खतरा भी रहता है '' l ऐसा सुन कुम्भा और चूण्डा ने राव जोधा को मंडोर पर कब्ज़ा हो जाने का संदेसा भिजवा दिया l लेकिन राव जोधा ने मंडोर पर हमला कर दिया और चूण्डा के 3 पुत्र कुंतल , मंजा और सुआ मारे गए l जिसका बदला लेने के लिए चूण्डा ने 1453 मंडोर पर चढाई का फैसला कर दिया l किन्तु तभी अचानक मेवाड़ पर तुर्की मुस्लिमों ने चारों और से हम्ला बोल दिया l क्यूंकि उन्हीं दिनों 1453 के आस पास में एक और घटना घटी की महाराणा कुम्भा [20] और चूण्डा ने नागौर पर कब्ज़ा कर लिया था क्यूंकि वहां के सुल्तान शम्स खान ने गुजरात के सुल्तान क़ुतुबुद्दीन से मेवाड़ के खिलाफ संघठन कर लिया जबकि उसको नागौर पर कब्ज़ा करने में मेवाड़ से ही सहायता मिली थी क्यूंकि उसके पिता सुल्तान फ़िरोज़ खान के मरने के बाद उसके चाचा माजिद खान ने नागौर पर कब्ज़ा कर लिया था l कुम्भा और चूण्डा ने शम्स खान को नागौर दिलाने का कारण वहां गौ हत्या पर रोक लगाने की संधि करवाना, जोधा के बड़ते कदमों पर लगाम पाना और अंत में नागौर की मुस्लिम सल्तनत में झगडे का फायदा उठाना ही था l 1453 में शम्स खान को दगाबाजी की सजा तो मिली पर इससे बोखलाए उसके दोस्त गुजरात के क़ुतुबुद्दीन शाह और मांडू के सुल्तान महमूद खिल्जी ने 1440 की पुरानी हार ( जिसमे उस समय गुजरात का सुल्तान अहमद शाह था जिसकी 1442 में मृत्यु हो गयी थी  ) का बदला लेने के लिए फिर से चित्तौड़ पर चारो तरफ से हमले शुरू कर दिए l महमूद खिल्जी ने मंडलगड़ और अजमेर पर कब्ज़ा कर लिया और कुतबुद्दीन ने सिरोही पर कब्ज़ा कर कुम्भलगढ़ पर आक्रमण कर दिया l ऐसी विकट स्थिति में कुम्भा ने चूण्डा और राव जोधा के मध्यस्त 1453 में बैराथ्गढ़ में संधि कराई और फिर मेवाड़ी सेना ने तुर्कों को फिर से पराजित किया जिसमे निस्संदेह चूण्डा ने अभूतपूर्व योगदान दिया और 1456 तक मेवाड़ पूर्ण रूप से फिर आज़ाद हो गया l इतिहास के पन्नो में वीर योद्धा रावत चूण्डा इस घटना के बाद आश्चर्यजनकरूप से अदृश्य हो गया जिसके विषय में सारे इतिहासकार मौन हैं l इसप्रकार वीर, सत्यव्रत, त्यागी, और पित्रभक्त चूण्डा ने अपना सारा जीवन घोर संघर्ष और त्याग में मेवाड़ के लिए न्योछावर कर दिया सो उसके वंशज आगे ''चूण्डावत'' नाम से विख्यात हुए l किन्तु इस त्याग और बलिदान का सिलसिला यही समाप्त नहीं हुआ बल्कि चूण्डा के वंशजो ने इसे कायम रखा और मेवाड़ महाराणा की सहायता और सेवा में कई और कीर्तिमान रचे और बड़ी बड़ी जंगो और खूंखार युद्ध अभियानी में हरावल में रहते हुए सर कटा दिए और भालों और तोप के गोलों को अपने सीने पे झेला लेकिन कभी महाराणा को आंच नहीं आने दी l आगे हम पढेंगे के महाराणा के सम्मान के लिए चूण्डावतों ने कभी अपने इमान को नहीं छोड़ा, कई बार महाराणा चूण्डावतों से नाराज़ भी हुए लेकिन कभी भी चूण्डा के पाटवी वंशजों और उनके भाई-बेटो-सहोगियों ने महाराणा के ऊपर चढाई नहीं की बल्कि हर प्रयास किया के मेवाड़ में शांति कायम रहे और महाराणा सुखी रहे l
रावत चूण्डा ने कुल 5 विवाह करे जिससे उनके कुल 15 संताने हुई –
1. कांधल चूण्डावत
2. कुंतल चूण्डावत (ठि.भरख, ठि.परावल)
3. तेज सिंह चूण्डावत (ठि.सूर्यगड़, ठि.लिम्बोद, ठि.बेगूँ, ठि.कनेरा, ठि.बस्सी)
4. जेत सिंह चूण्डावत
5. मांजा चूण्डावत (कटार और सलूम्बर के पास के कुछ ठिकाने)
6. सुआ चूण्डावत
7. आसा चूण्डावत (ठि.भरचड़ी) - यह एक महान योद्धा था जिसे अपनी तलवार से बड़ा लगाव था जिससे उसने सहस्त्रों शत्रुओं का दमन किया l
8. रासा चूण्डावत
9. रणधीर चूण्डावत - (ठि.काटून्द)
10. जयमल चूण्डावत
11. पदम् कुंवर चूण्डावत (बाईजीराज)
12. भीम चूण्डावत
13. देव चूण्डावत
14. सांवलदास चूण्डावत
15. ईसरदास चूण्डावत

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

वीर सोढा राजपूत

   गर्मियों का मौसम था बाड़मेर संभाग में रेत के टीले गर्मी से गर्म होकर अंगारों की तरह दहक रहे थे| लूएँ ऐसे चल रही थी कि बाहर बैठे जीव को झुलसा दे| इस तरह नीचे धरती गर्मी से तप रही थी तो ऊपर आसमान झुलस रहा था|
वहीँ खेजडे के एक पेड़ की छाया में बैठा एक सोढा राजपूत जवान बाहर की गर्मी की साथ भीतर से उठ रहे विचारों के दावानल से दहक रहा था| पेड़ की छाया में बैठ विचारों में खोये उस सोढा राजपूत जवान को पता ही नहीं चला कि कब छाया ढल गयी और उसके चेहरे पर कब तपते सूरज की किरणे पड़ने लग गयी| वह
तो विचारों के भंवर में ऐसा खोया था कि उसके लिए तो आज चारों दिशाएँ व सभी मौसम एक जैसे ही थे| आज ही उसके होने वाले ससुर का सन्देश आया था कि –
“यदि उसकी बेटी के साथ शादी करनी है तो दो हजार रूपये भेजवा दें नहीं तो तुम्हारा रिश्ता तोड़कर तुम्हारी मंगेतर की शादी कहीं और करवा दी जाएगी|”
ये सन्देश सुनने के बाद उस जवान सोढा राजपूत
का गुस्सा सातवें आसमान था, गुस्से में उसके दांत कटकटा रहे थे चेहरा लाल था आखों में भी लाल डोरे साफ़ नजर आ रहे थे|
सन्देश पढ़ते ही अपने आप उसका हाथ कमर पर बंधी तलवार की मूंठ पर जा ठहरा| आखिर उसकी मंगेतर जिसकी उसके माँ बाप ने आज से दस वर्ष पहले शादी का जोडा देकर
उसके साथ रिश्ता किया था और बेचारे पुत्र
की शादी करने के मंसूबे मन में बांधे ही इस दुनियां से चल बसे| माता पिता की मृत्यु के बाद बड़ी मुश्किल से उसने अपने आपको संभाला पर फिर भी जी तो गरीबी में ही रहा है इसलिए अब ससुर को देने के लिए दो हजार रूपये कहाँ से लाये| बचपन से ही खेत खलिहान भी सेठ धनराज के यहाँ गिरवी पड़े है| अब क्या गिरवी रखे कि उसे दो हजार जैसी बड़ी रकम
मिल जाए ? यही सब सोचते हुए उस जवान सोढा राजपूत की आँखों में खून उतर आया था| उसने मन में सोच लिया था उसके जिन्दा रहते
उसकी मंगेतर जिससे शादी करने के सपने वह पिछले दस वर्षों से देख रहा था किसी और की हो ही नहीं सकती|
यही सोचकर वह सेठ धनराज के पास दो हजार रूपये के कर्ज के लिए पहुंचा|
सेठ को सारी बात बताते हुए उसने कहा- “सेठ काका ! अब मेरी इज्जत बचाना आपके हाथ में है|
सेठ बोला- “इज्जत तो मैंने बहुतों की बचाई है
तेरी भी बचा दूंगा पर यह बता दो हजार जितनी बड़ी रकम के लिए तेरे पास गिरवी रखने को क्या है ?”
सेठ काका- “जमीन तो जितनी थी पहले ही आपके पास गिरवी रखी है अब मेरे पास तो सिर्फ यह तलवार बची है और आपको पता है ना कि एक राजपूत के लिए तलवार की क्या कीमत होती है ? आप इसे ही गिरवी रखलें|
सेठ बोला- “इस तलवार का मैं क्या करूँ ? तूं किसी और सेठ के जा कर कर्ज ले ले|
सोढा जवान सेठ की बात सुनकर अन्दर तक तड़फते हुए कहने लगा- “सेठ काका ! मेरे पुरखों की वो जमीन जिसे पाने के लिए उन्होंने सिर कटवाए थे उसको आपने झूंठ लिख लिखकर
अपने पास गिरवी रख लिया मेरे घर का एक एक बर्तन तक आपने अपनी कलम की झूंठ के बल से ठग लिए| फिर भी मैंने आपको सब कुछ दिया और अब भी आप जो मांगे वो देने के लिए तैयार हूँ| यह मेरे घराने की साख का सवाल है| आपको पता है मेरे जीते जी मेरी मंगेतर का विवाह किसी और से हो जायेगा तो मेरे लिए तो यह जीवन बेकार है| मैं तो जीवित ही मरे समान हो जाऊंगा|
आपको जितना ब्याज लेना है ले लो पर अभी आज मुझे दो हजार रूपये का कर्ज दे दो| आपका कर्ज में ईमानदारी से चूका दूंगा यह एक राजपूत का वादा है|”
सेठ-“ठीक है ! यदि तूं राजपूतानी का जाया है तो एक वचन दे| मैं जो लिखूंगा उस पर दस्तखत कर देगा ?
सोढा जवान ने हाँ कह वचन देने की हामी भर ली| सेठ ने एक पत्र पर एक शर्त लिखी और सोढा राजपूत के हाथ में यह कहते हुए थमा दी कि- “असल राजपूत है और हिम्मत है तो ये पत्र ले शर्त पढ़कर दस्तखत करदे| उस पत्र में शर्त लिखी थी- “जब तक सेठ धनराज का कर्ज ब्याज सहित ना चूका दूंगा तब तक अपनी पत्नी को बहन के समान समझूंगा|”
पत्र में लिखी शर्त पढ़ते ही सोढा की आँखों में अंगारे बरसने लगे उसकी आँखें लाल हो गयी पर उसने अपने गुस्से को दबाते हुए पिसते दांतों को होठों के पीछे छुपाकर दस्तखत कर दिए|
सेठ से मिले कर्ज के दो हजार रूपये ससुर के पास समय से पहले भिजवाकर सोढा ने अपनी मंगेतर से शादी कर अपना घर बसा लिया| आज कई वर्षों बाद उसका दीमक लगा टुटा फूटा घर लिपाई पुताई कर सजा संवरा था|
ससुराल से दहेज़ में आया सामान भी घर में तरतीब से सजा था| आँगन में आज छम छम पायल की आवाज सुनाई दे रही थी तो शाम को बाजरे की रोटियों को थपथपाने के साथ चूड़ियों की आवाज भी साफ़ सुनाई दे रही थी|
सोढा खाने के लिए बैठा था और उसकी सजी संवरी पत्नी अपने हाथों से उसे खाना परोस
रही थी| सोढा खाना खाते हुए भी बड़ा गंभीर नजर आ रहा था तो दूसरी और उसकी पत्नी की आँखों में उसके लिए जो प्यार उमड़ रहा था उसे सोढा साफ़ देख रहा था|
पत्नी खाने में ये परोसूं या ये कह कह कर बात करने की कोशिश कर रही थी| सोढा भी बोलना तो चाह रहा था पर बोल नहीं पा रहा था| सोढा खाना खाकर उठा राजपूतानी ने झट से खड़े होकर पानी का लौटा ले सोढा के हाथ धुलवाये| हाथ धोते समय घूंघट के पीछे उसका दमकता चेहरा देख सोढा के हाथ कांप गए| रात पड़ी,
सोने का समय हुआ, दोनों ढोलिया पर सो गए पर यह क्या ? सोढा ने म्यान से तलवार निकाली और दोनों के बीच रख मुंह फिरा सो गया|
राजपूतानी सोचने लगी- “शायद मेरे से किसी बात पर नाराज है या मेरे पिता द्वारा शादी से पहले दो हजार रूपये लेने के कारण नाराज है|
एक, दो, तीन इस तरह कोई बीस दिन बीत गए हर रोज सोते समय दोनों के बीच तलवार होती|
राजपूतानी को सोढा का यह व्यवहार समझ ही नहीं आ रहा था दिन में तो बात करते सोढा के मुंह से फूल बरसते है आखों से बरसता नेह भी साफ़ झलकता है पर रात होते ही वह नजर नहीं मिलाता, उसका चेहरा मुरझाया होता है, बोल
होठों से बाहर आते ही नहीं| राजपूतानी ने रोज
सोढा का व्यवहार का बारीकी से देखा समझा और एक दिन बोली-
“यदि आप मेरे पिता द्वारा रूपये मांगे जाने से नाराज है तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं पर यदि मेरे द्वारा कोई अनजाने में गलती हुयी हो तो उसके लिए बताएं मैं आपसे माफ़ी मांग लुंगी पर आप नाराज ना रहे|”
सोढा ने कहा-“ऐसी कोई बात नहीं है यह कोई और ही बात है जो मैं आपको चाहते हुए भी बता नहीं सकता| बताने की कोशिश भी करता हूँ तो शब्द होठों तक नहीं आते|” और कहते कहते सोढा ने वह सेठ द्वारा लिखा पत्र राजपूतानी को पकड़ा दिया|
दिये की बाती ऊँची कर उसके टिम टिम करते प्रकाश में राजपूतानी ने वह पत्र पढना शुरू किया उसने जैसे जैसे वह पत्र पढ़ा उसके चेहरे पर तेज बढ़ता गया उसके बेसब्र मन ने राहत की साँस ली| पत्र पढने के बाद उसे अपने पति पर गर्व हुआ कि वह राजपूती धर्म निभाने वाले एक सच्चे राजपूत की पत्नी है और एक राजपूतानी के लिए इससे बड़ी गर्व की क्या बात हो सकती है| पूरा पत्र पढ़ राजपूतानी बेफिक्र हो बोली –“बस
यही छोटी सी बात थी| मुझे तो दूसरी ही चिंता थी| वचन निभाना तो एक राजपूत और राजपूतानी के लिए बहुत ही आसान काम है|” और कहते हुए राजपूतानी ने अपने सारे
गहने आदि लाकर पति के आगे रख दिए| और बोली- “इनको बेचकर घोड़ा खरीद लाईये| कर्ज उतरना सबसे पहला धर्म है और वो घर बैठे नहीं चुकेगा| घर तो कृषक बैठते है राजपूत को घर बैठना वैसे भी शोभा नहीं देता| राजपूत की शोभा तो किसी राजा की सेना में ही होती है|
सोढा बोला-“ठीक है फिर घोड़ा ले मैं
किसी की राजा की नौकरी में चला जाता हूँ और तुझे अपने मायके छोड़ देता हूँ|”
राजपूतानी बोली-“मैंने भी एक राजपूत के घर जन्म लिया है, एक राजपूतानी का दूध पिया है, मुझे भी कमर पर तलवार बंधना व चलाना और घुड़सवारी करना आता है| बचपन में पिता के घर खूब घोड़े दौड़ाये है इसलिए मायके क्यों जाऊं
आपके साथ चलूंगी| दोनों कमाएंगे तो कर्ज जल्दी चुकेगा|”
ऐसे शब्द बोलती हुयी राजपूतानी के चेहरे को तेज को देख सोढा तो देखता रह गया| सुबह का निकला सूरज अब आकाश में काफी ऊँचा चढ़
चूका था| चितौड़ किले की तलहटी से दो एक किलोमीटर दूर दो बांके जवान घोड़े दौड़ाते हुए किले की तरफ आते नजर आ रहे थे| उनके हाथों में पकड़े भाले सूरज की किरणों से पल पल
कर चमक रहे थे| दोनों की कमर में बंधी तलवारें दोड़ते घोड़ों की पीठ से रगड़ खा रही थी| उन्हें देखकर कौन कह सकता था कि- इनमें से एक मर्द की पौशाक में नारी है|
राजपूतानी इस वक्त मर्दाना भेष में जोश से भरा एक जवान लग रही थी| हाथों में भाला पकड़े उसने अपनी कोयल सी मधुर आवाज को भी मर्दों की तरह भारी कर लिया था| घूंघट में रहने वाला चेहरा आज सूरज की रौशनी में
दमक रहा था| बड़ी बड़ी आँखों ने लाल लाल डोरे ऐसे नजर आ रहे थे जैसे देश प्रेम का मतवाला कोई बांका जवान दुश्मन की सेना पर आक्रमण के लिए चढ़ा हो| घोड़ो को दौड़ाते हुए थोड़ी ही देर में वे किले की तलहटी में जा पहुंचे| उधर
उनका किले के मुख्य दरवाजे की और जाना हुआ उधर से किले से राणा का अपने दल बल सहित शिकार के लिए निकलना हुआ| दो बाकें जवानों को देखते ही राणा की नजरें दोनों पर एकटक अटक गयी| पास बुलाकर पूछा-
कौन हो ? कहाँ से आये हो ? क्यों आये हो ?
राणा को जबाब मिला- “राजपूत है|”
कौन से ? सोढा ! और आपकी सेवा में चाकरी करने आयें है|
ठीक है शिकार में ही साथ हो जाओ| राणा ने
उनकी सेवा स्वीकारते हुए कहा|
दोनों राणा के साथ हो गए| जंगल में शिकार शुरू हुआ, एक सूअर पर शिकारी दल ने तीरों भालों से हमला किया पर सूअर भाग खड़ा हुआ और राणा के सरदारों ने उसके पीछे घोड़े दौड़ा दिए| चारों और से हाका करने वालों ने हाका करना शुरू कर दिया उधर गया है, घोड़ा पीछे दौड़ाओ, सूअर भाग ना पाये|
राणा ने देखा सभी सरदारों व शिकारी दल के घोड़े सूअर के पीछे लग गए उनमें से एक घोड़ा अचानक बिजली की गति से आगे निकला और घोड़े के सवार ने सूअर का पीछा कर उस पर
भाला फैंका जो सूअर की आंते बाहर निकालता हुआ सूअर के शरीर से पार हो गया| राणा के मुंह से अचानक निकल पड़ा –
शाबास ! आजतक ऐसा नजारा नहीं देखा कि किसी का भाला सूअर की आंते निकालकर पार निकल गया हो|
घोड़े से उतर पसीना पोंछते सवार ने राणा को झुककर मुजरा किया और वापस घोड़े की पीठ पर जा सवार हुआ|
कोई नहीं पहचान सका कि एक हाथ से भाले का वार कर सूअर को धुल चटाने वाला जवान मर्द नहीं एक औरत है|
राणा उनकी वीरता से खुश व प्रभावित होते हुए और उन्हें अपनी सेवा में नियुक्त करते हुए हुक्म दिया कि –“वे दोनों उनके महल में उनके शयन कक्ष की सुरक्षा में तैनात रहेंगे|”
“खम्मा अन्न दाता” कह दोनों ने राणा की चाकरी स्वीकारी|
सावन का महिना, रिमझिम रिमझिम फुहारों से बारिश बरस रही, नदी नाले भी खल खल कर बह रहे, चारों और हरियाली ही हरियाली छा रही, तालाब पानी से भरे हुए और रात भर मेंडकों की टर्र टर्र आवाजें आ रही,अंधरी रात्री और ऊपर से काले काले बादल छाये हुए, बिजली चमके तो आँखें बंद हो जाए, बादल ऐसे गरज रहे जैसे इंद्र
गरज कर कह रहा हो कि धरती को इसी तरह पीस दूंगा, ऐसे अंधरी व भयानक पर मनोहारी रात, ऐसी रात जिसमें हाथ को हाथ ना दिखे जिसमें दोनों राणा के शयन कक्ष के बाहर
पहरा दे रहे और राणा जी अपने शयन कक्ष में निश्चिन्त हो रानी के साथ सो रहे थे| दोनों हाथों में नंगी तलवारे लिए पहरा दे रहे थे जैसे ही बिजली चमकती तो टकराने वाले प्रकाश से तलवारें भी अँधेरी काली रात में चमक उठती| आधी रात का वक्त हो चूका था राणा जी गहरी नींद में सो रहे थे पर आज पता नहीं क्यों रानी को नींद नहीं आ रही थी| सो वह पलंग पर लेटी लेटी महल की खिड़की से प्रकृति के अद्भुत नज़ारे
देख रही थी| महल के द्वार पर दो राजपूत हाथों में तलवारें लिए पहरा देते हुए चौकस हो खड़े थे|
इतनी ही देर में उतर दिशा से बिजली चमकी जिसे देख राजपूतानी को याद आई कि यह तो मेरे देश की तरफ से चमकी है और वह इस याद के साथ ही विचारों में खो गयी उसके नारी हृदय में विचारों की उथल पुथल मच गयी कि आज ऐसे मौसम में सभी स्त्रियाँ अपने पति के साथ
घर में सो रही है और वह खाने कमाने के लिए मर्दाना भेष में तलवार हाथ में पकड़े यहाँ पहरे पर खड़ी है| तभी पपीहे की मधुर आवाज उसे सुनाई दी और सुनते ही उसका नारी हृदय कराह उठा और मन में फिर विचार आने लगा कि वह तो सुहागन होते हुए वियोगन हो गयी, पति के पास होते हुए भी ऐसा लग रहा है जैसे वह पति से कोसों दूर है| पति के साथ रहते हुए भी वह वियोगी है उससे तो पति से दूर रहने वाली वियोगी नारी ही अच्छी और सोचते सोचते
उसकी सब्र का बाँध टूट गया और सोढा के पास जाकर धीरे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया| हाथ रखते ही दोनों ऐसे कांप गए जैसे उन पर बिजली टूट पड़ी हो| सोढा ने चेताते हुए
कहा-“राजपूतानी संभल ! राजपूतानी सोढा द्वारा चेताने पर अपने आपको एक गहरी निस्वाश: छोड़ते हुए सँभालते हुए बोली-
देस बिया घर पारका, पिय बांधव रे भेस | जिण जास्यां देस में, बांधव पीव करेस ||
अपना देश छुट गया और अब परदेश में है| पति पास है पर वह भाई रूप में है | जब कभी अपने वतन जायेंगे तो पति को पति बनायेंगे|
चमकती बिजली की रौशनी में रानी सोये सोये
दोनों की पुरी लीला देख रही थी| सुबह होते ही रानी ने राणा जी से कहा कि –
“इन दोनों सोढा राजपूत भाइयों में कोई भेद है क्योंकि इनमें से एक औरत है|”
नहीं रानी ! ऐसा नहीं हो सकता और ऐसा है
तो धोखा करने के जुर्म में मैं इनका सिर तोड़ दूंगा| राणा ने कहा| “राणा जी ! तोड़ने की जरुरत नहीं जोड़ने की जरुरत है क्योंकि इनमें एक औरत है|” रानी ने राणा को जबाब दिया|
राणा बोले-“रानी भोली बात मत किया करो !
इनकी रोबदार सूरत, इनकी आँखों के तेवर व इनके चेहरे के तेज को देखो ऐसा तेज किसी मर्द में ही हो सकता है फिर मैंने तो एक खतरनाक सूअर को एक ही वार में मारते हुए इनकी वीरता भी देखी है|”
राणा और रानी में इस बात को लेकर विवाद हुआ और फिर इनकी परीक्षा लेनी की बात तय हुई| रानी ने दोनों की परीक्षा लेने की जिम्मेदारी खुद ली और दोनों को रानी ने दोनों को अपने में बुला लिया, साथ ही राणा जी को जाली से छुपकर देखने को कहा|
रानी ने चूल्हे पर दूध चढ़ा अपनी दासी को चुपचाप बाहर जाने का ईशारा कर दिया दासी रसोई से चली गयी, थोड़ी देर में दूध उफनने ही वाला था | जिसे पर नजर पड़ते ही राजपूतानी तुरंत चिल्ला पड़ी- “दूध उफनने वाला है दूध
उफनने वाला है ! सुनते ही पास के कक्ष से निकल रानी बोल पड़ी- “बेटी सच बता तूं कौन है ? और इस भेष में क्यों ? मुझसे कुछ भी मत
छुपा सच सच बता|”
राजपूतानी आँखों पर हाथ दे रानी की गोद में चिपट गयी और सोढा बे रानी को पुरी बात बताई|
राणा जी भी कक्ष के बाहर जाली के पीछे खड़े सब सुन रहे थे|
पुरी बात सुनकर राणा जी बड़े खुश हुए बोले-
“मैं एक सवार को रूपये देकर तुम्हारे गांव आज ही भेज देता हूँ वह सेठ धनराज से तुम्हारे कर्ज का पूरा हिसाब कर ब्याज सहित रकम चुका आयेगा| और तुम यहीं रहो और अपनी गृहस्थी बसावो|”
राणा जी के आगे हाथ जोड़ते हुए सोढा बोला- “अन्न दाता का हुक्म सिर माथे ! पर अन्न दाता जब तक मैं अपने हाथ से सेठ का कर्ज नहीं चूका देता तब तक शर्तनामा लिखा पत्र नहीं फाड़ सकता| इसलिए मुझे कर्ज चुकाने के लिए स्वयं जाने की इजाजत बख्सें|”
राणा जी ने सोढा को ब्याज सहित पूरा कर्ज चुकाने व गृहस्थी बसाने लायक धन देकर विदा किया| अब सोढा और राजपूतानी को जब भी उस रात की याद आती दोनों को बड़ी मीठी लगती|