सोमवार, 2 मार्च 2015

जयमल मेड़तिया

अठै क उठै (यहाँ कि वहां )

जोधपुर के शासक राव मालदेव के साथ लम्बे संघर्ष व अनेक युद्धों में मेड़ता के शासक व उस ज़माने के अद्वितीय योद्धा राव जयमल को जान-माल का बहुत नुकसान उठाना पड़ा था और अब मेड़ता पर मुगलों के बागी सेनापति सेफुद्दीन को जयमल द्वारा शरण देने से नाराज अकबर की विशाल शाही सेना ने चढाई कर दी |

जयमल के पास इसका समाचार मिलते ही जयमल ने अपने सहयोगियों के साथ गंभीर विचार कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इतनी विशाल शाही सेना से टकराना अब सब तरफ से हानिकारक होगा !

पिछले युद्धों में अपने से दस दस गुना बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध कर राव जयमल मेडतिया ने यश अर्जित किया किन्तु उनकी जनता के कई घर उजड़ गए और अधिक लोगों को मरवाने की तुलना में उसने मेड़ता खाली करने का विचार किया | शाही सेना के मेड़ता पहुँचने पर जयमल ने शाही सेनापति हुसैनकुलीखां से बातचीत कर उसे समझाने का प्रयास किया तथा अंत में मेड़ता उसे सोंप कर परिवार सहित वहां से निकल लिया |

मेड़ता छोड़ने के बाद वह अपने परिवार व साथी सरदारों के साथ वीरो की तीर्थ स्थली चित्तोड़ के लिए रवाना हो गया | उस ज़माने में चित्तोड़ देशभर के वीर योद्धाओं का पसंदीदा तीर्थ स्थान था मातृभूमि पर मर मिटने की तम्मना रखने वाला हर वीर चित्तोड़ जाकर बलिदान देने को तत्पर रहता था |

जयमल का काफिला मेवाड़ के पहाड़ी जंगलों से होता हुआ चित्तोड़ की तरफ बढ़ रहा था कि अचानक एक भील डाकू सरदार ने उनका रास्ता रोक लिया अपनी ताकत दिखाने के लिए भील सरदार ने एक सीटी लगाई और जयमल व उसके साथियों के देखते ही देखते एक पेड़ तीरों से बिंध गया |

जयमल व साथी सरदार समझ चुके थे कि हम डाकू गिरोह से घिर चुके है और इन छुपे हुए भील धनुर्धारियों का सामना कर बचना बहुत मुश्किल है वे उस क्षेत्र के भीलों के युद्ध कौशल के बारे में भलीभांति परिचित भी थे | कुछ देर की खामोशी के बाद राव जयमल के एक साथी सरदार ने जयमल की और मुखातिब होकर पूछा - " अठै क उठै " | जयमल का जबाब था " उठै " |

जयमल के जबाब से इशारा पाते ही काफिले के साथ ले जाया जा रहा सारा धन चुपचाप भील डाकू सरदार के हवाले कर काफिला आगे बढ़ गया | डाकू सरदार को हथियारों से सुसज्जित राजपूत योद्धाओं का इस तरह समर्पण कर चुपचाप चले जाना समझ नहीं आया | और उसके दिमाग में "अठै क उठै " शब्द घूमने लगे वह इस वाक्य में छुपे सन्देश को समझ नहीं पा रहा था और बेचैन हो गया आखिर वह धन की पोटली उठा घोडे पर सवार हो जयमल के काफिले का पीछा कर फिर जयमल के सामने उपस्थित हुआ और हाथ जोड़कर जयमल से कहने लगा !!
हे वीर ! आपके लश्कर में चल रहे वीरों के मुंह का तेज देख वे साधारण वीर नहीं दीखते |
हथियारों व जिरह वस्त्रो से लैश इतने राजपूत योद्धा आपके साथ होने के बावजूद आपके द्वारा इतनी आसानी से बिना लड़े समर्पण करना मेरी समझ से परे है कृपया इसका कारण बता मेरी शंका का निवारण करे व साथ ही मुझे " अठै क उठै " वाक्य में छिपे सन्देश के रहस्य से भी अवगत कराएँ |

तब जयमल ने भील सरदार से कहा - मेरे साथी ने मुझसे पूछा कि "अठै क उठै " मतलब कि ( अठै ) यहाँ इस थोड़े से धन को बचाने के लिए संघर्ष कर जान देनी है या यहाँ से बचकर चित्तोड़ पहुँच (उठै ) वहां अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध करते हुए प्राणों की आहुति देनी है |
तब मैंने कहा " उठै " मतलब कि इस थोड़े से धन के लिए लड़ना बेकार है हमें वही अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ युद्ध कर अपने अपने प्राणों को देश के लिए न्योछावर करना है |

इतना सुनते ही डाकू भील सरदार सब कुछ समझ चूका था उसे अपने किये पर बहुत पश्चाताप हुआ वह जयमल के चरणों में लौट गया और अपने किये की माफ़ी मांगते हुए कहना लगा-
हे वीर पुरुष ! आज आपने मेरी आँखे खोल दी, आपने मुझे अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से अवगत करा दिया !!

मैंने अनजाने में धन के लालच में अपने वीर साथियों के साथ अपने देशवासियों को लुट कर बहुत बड़ा पाप किया है आप मुझे क्षमा करने के साथ-साथ अपने दल में शामिल करले ताकि मै भी अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर सकूँ और अपने कर्तव्य पालन के साथ साथ अपने अब तक किये पापो का प्रायश्चित कर सकूँ |
और वह भील डाकू सरदार अपने गिरोह के धनुर्धारी भीलों के साथ जयमल के लश्कर में शामिल हो अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ चित्तोड़ रवाना हो गया और जब अकबर ने १५६७ ई. में चित्तोड़ पर आक्रमण किया तब जयमल के नेत्रित्व में अपनी मातृभूमि मेवाड़ की रक्षार्थ लड़ते हुए शहीद हुआ ।

राव कुंपा, राव जेता (जोधपुर):-

जोधपुर राज्य के इतिहास में जहाँ वीर शिरोमणि दुर्गादास स्वामिभक्ति के लिये प्रशिध है तो राव कुंपा और उसके चचेरे भाई जेता का नाम प्रशिध दक्ष सेनापति,वीरता,साहस,पराक्रम और देश भक्ति के लिए मारवाड़ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है |
राव कुंपा जोधपुर के राजा राव जोधा के भाई राव अखैराज के पोत्र व मेहराज के पुत्र थे इनका जनम वि.सं. 1559 कृष्ण द्वादशी माह को राडावास धनेरी (सोजत) गांव में मेहराज जी की रानी क्रमेती भातियानी जी के गर्भ से हुवा था |
राव जेता मेहराज जी के भाई पंचायण जी का पुत्र था अपने पिता के निधन के समय राव कुंपा की आयु एक साल थी,बड़े होने पर ये जोधपुर के शासक मालदेव की सेवा में चले गए |
मालदेव अपने समय के राजस्थान के शक्तिशाली शासक थे राव कुंपा व जेता जेसे वीर उसके सेनापति थे,मेड़ता व अजमेर के शासक विरमदेव को मालदेव की आज्ञा से राव कुंपा व जेता ने अजमेर व मेड़ता छीन कर भगा दिया था |
राव कुंपा, राव जेता और राव विरमदेव:-
अजमेर व मेड़ता छीन जाने के बाद राव विरमदेव ने डीडवाना पर कब्जा कर लिया लेकिन राव कुंपा व जेता ने राव विरमदेव को डीडवाना में फिर जा घेरा और भयंकर युद्ध के बाद डीडवाना से भी विरमदेव को निकाल दिया, विरमदेव भी उस ज़माने अद्वितीय वीर योधा था |
डीडवाना के युद्ध में राव विरमदेव की वीरता देख राव जेता ने कहा था कि यदि मालदेव व विरमदेव शत्रुता त्याग कर एक हो जाये तो हम पूरे हिन्दुस्थान पर विजय हासिल कर सकतें है
राव कुंपा, राव जेता और शेरशाह सूरी:-
राव कुंपा व राव जेता ने मालदेव की और से कई युधों में भाग लेकर विजय प्राप्त की और अंत में वि.सं. 1600 चेत्र शुक्ल पंचमी को सुमेल युद्ध में दिल्ली के बादशाह शेरशाह सूरी की सेना के साथ लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की |
इस युद्ध में बादशाह की अस्सी हजार सेना के सामने राव कुंपा व जेता दस हजार सेनिकों के साथ थे भयंकर युद्ध में बादशाह की सेना के चालीस हजार सेनिक काट डालकर राव कुंपा व जेता ने अपने दस हजार सेनिकों के साथ वीर गति प्राप्त की मातर भूमि की रक्षार्थ युद्ध में अपने प्राण न्योछावर करने वाले मरते नहीं वे तो इतिहास में अमर हो जाते है |
अमर लोक बसियों अडर,रण चढ़ कुंपो राव !
सोले सो बद पक्ष में चेत पंचमी चाव.....!!
उपरोक्त युद्ध में चालीस हजार सेनिक खोने के बाद शेरशाह सूरी आगे जोधपुर पर आक्रमण की हिम्मत नहीं कर सका व विचलित होकर शेरशाह ने कहा
बोल्यो सूरी बैन यूँ , गिरी घाट घमसान
मुठी खातर बाजरी,खो देतो हिंदवान
कि मुठी भर बाजरे कि खातिर में दिल्ली कि सल्तनत खो बैठता,और इसके बाद शेरशाह सूरी ने कभी राजपूताना में आक्रमण करने कि गलती नहीं की।
सत सत नमन है क्षत्रिय वीर योद्धाओ को।

क्रांतिकारी आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह

ठाकुर कुशाल सिंह :-

रचनाकार : गंगासिंह भायल मूठली

जिस तरह से वीर कुँवर सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए अपना रण-रंग दिखाया उसी तरह राजस्थान में आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने भी अपनी अनुपम वीरता से अंग्रेजो का मान मर्दन करते हुए क्रांति के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी ।

पाली ज़िले का एक छोटा सा ठिाकाना था "आउवा" लेकिन ठाकुर कुशाल सिंह की प्रमुख राष्ट्रभक्ति ने सन् सत्तावन में आउवा को स्वातंत्र्य-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया । ठाकुर कुशाल सिंह तथा मारवाड़ का संघर्ष प्रथम स्वतंत्रता का एक स्वर्णिम पृष्ठ है।

जोधपुर के देशभक्त महाराजा मान सिंह के संन्यासी हो जाने के बाद अंग्रेजो ने अपने पक्ष के तख़्त सिंह को जोधपुर का राजा बना दिया । तख़्त सिंह ने अंग्रेजो की हर तरह से सहायता की ।

जोधपुर राज्य उस समय अंग्रेजो को हर साल सवा लाख रुपया देता था । इस धन से अंग्रेजो ने अपनी सुरक्षा के लिए एक सेना बनाई, जिसका नाम घ् जोधपुर लीजन ' रखा गया । इस सेना की छावनी जोधपुर से कुछ दूर एरिनपुरा में थी । अँग्रेज़ सेना की राजस्थान की छह प्रमुख छावनियों में यह भी एक थी ।

राजस्थान में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद से हुई थी । इसके बाद नीमच और देवली के भारतीय सैनिक भी संघर्ष में कूद चूके थे । अब बारी थी एरिनपुरा के घ् जोधपुर लीजन ' की, जिसे फ़िरंगियों ने ख़ासकर अपनी सुरक्षा के लिए बनाया था ।

सूबेदार गोजन सिंह का आबू पर हमला :-

जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह अंग्रेजो की कृपा से ही सुख भोग रहे थे, अतः स्वतंत्रता यज्ञ की जवाला भड़कते ही उन्होंने तुरंत अंग्रेजो की सहायता करने की तैयार कर ली । जोधपुर की जनता अपने राजा के इस आचरण से काफ़ी ग़ुस्से में थी । राज्य की सेना भी मन से स्वाधीनता सैनानियों के साथ थी तथा घ् जोधपुर लीजन ' भी सशस्त्र क्रांति के महायज्ञ में कूद पड़ना चाहती थी ।
नसीराबाद छावनी में क्रांति की शुरुआत होते ही जोधपुर-नरेश ने राजकीय सेना की एक टुकड़ी गोरों की मदद के लिए अजमेर भेद दी । इस सेना ने अंग्रेजो का साथ देने से इंकार कर दिया ।

कुशलराज सिंघवी ने सेनापतित्व में जोधपुर की एक और सेना नसीराबाद के भारतीय सैनिकों को दबाने के लिए भेजी गई । इस सेना ने भी अंग्रेजो का साथ नहीं दिया ।
हिण्डौन में जयपुर राज्य की सेना भी जयपुर नरेश की अवज्ञा करते हुए क्रांतिकारी भारतीय सेना से मिल गई । इस सब घटनाओं का अंग्रेजों की विशेष सेना घ् जोधपुर लीजन ' पर भी असर पड़ा । इसके सैनिकों ने स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने का निश्चय कर लिया।

अगस्त 1857 में इस घ् लीजन ' की एक टुकड़ी को रोवा ठाकुर के ख़िलाफ़ अनादरा भेजा गया । इस टुकड़ी के नायक हवलदार गोजन सिंह थे । रोवा ठाकुर पर आक्रमण के स्थान पर 21 अगस्त की सुबह तीन बजे यह टुकड़ी आबू पहाड़ पर चढ़ गई । उस समय आबू पर्वत पर काफी संख्या में गोरे सैनिक मौजूद थे ।

गोजन सिंह के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के स्वतंत्रता सैनिकों ने दो तरफ़ से फ़िरंगियों पर हमला कर दिया । सुबह के धुंधलके में हुए इस हमले से अँग्रेज़ सैनिकों में भगदड़ मच गई । आबू से अंग्रेजो को भगा कर गोजन सिंह एरिनपुरा की और चल पड़े । गोजन सिंह के पहुँचते ही लीजन की घुड़सवार टुकड़ी तथा पैदल सेना भी स्वराज्य-सैनिकों के साथ हो गई । तोपखाने पर भी मुक्ति-वाहिनी का अधिकार हो गया । एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने मेहराब सिंह को अपना मुखिया चुना । मेहराब सिंह को घ् लीजन ' का जनरल मान कर यह सेना पाली की ओर चल पड़ी ।

आउवा में स्वागत :-

आउवा में चम्पावत ठाकुर कुशाल सिंह काफ़ी पहले से ही विदेशी (अँग्रेज़ी) शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का निश्चय कर चुके थें । अँग्रेज़ उन्हें फूटी आँखों भी नहीं सुहाते थे । नाना साहब पेशवा तथा तात्या टोपे से उनका संपर्क हो चूका था । पूरे राजस्थान में अंग्रेजो को धूल चटाने की एक व्यापक रणनीति ठाकुर कुशाल सिंह ने बनाई थी ।

सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था । बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ' को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह अंग्रेजो के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे ।

इसीलिए जब जनरल मेहरबान सिंह की कमान में जोधपुर लीजन के जवान पाली के पास आउवा पहुँचे तो ठाकुर कुशाल सिंह ने स्वातंत्र्य-सैनिकों का क़िले में भव्य स्वागत किया ।

इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए । लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे ।

सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर अंग्रेजो से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे । स्वाधीनता सैनिकों की विशाल छावनी ही बन गया आउवा ।
दिल्ली गए सैनिकों के अतिरिक्त हर स्वातंत्रता-प्रेमी योद्धा के पैर इस शक्ति केंद्र की ओर बढ़ने लगे । अब सभी सैनिकों ने मिलकर ठाकुर कुशाल सिंह को अपना प्रमुख चुन लिया ।

मॉक मेसन का सर काटा :-

आउवा में स्वाधीनता- सैनिकों के जमाव से फ़िरंगी चिंतित हो रहे थे अतः लोहे से लोहा काटने की कूटनीति पर अमल करते हुए उन्होंने जोधपुर नरेश को आउवा पर हमला करने का हुक्म दिया ।
अनाड़सिंह की अगुवाई में जोधपुर की एक विशाल सेना ने पाली से आउवा की ओर कूच किया । आउवा से पहले अँग्रेज़ सेनानायक हीथकोटा भी उससे मिला । 8 सितम्बर को स्वराज्य के सैनिकों ने घ् मारो फ़िरंगी को ' तथा घ् हर-हर महादेव ' के घोषों के साथ इस सेना पर हमला कर दिया । अनाड़सिंह तथा हीथकोट बुरी तरह हारे । बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध में अनाड़ सिंह मारा गया और हीथकोट भाग खड़ा हुआ । जोधुपर सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा ।

इस सेना की दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा । 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया । ब्रिटानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रिटानियों पर टूट पड़े । चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई । मॉक मेसन युद्ध में मारा गया ।
क्रांतिकारियों ने उसका सिर काट कर उसका शव क़िले के दरवाज़े पर उलटा लटका दिया । इस युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह तथा स्वातंत्र्य-वाहिनी के वीरों ने अद्भूत वीरता दिखाई ।

आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है । एक लोकगीत इस प्रकार है |

ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो ।
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो ।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो ।

इस बीच डीसा की भारतीय सेनाएँ भी क्रांतिकारियों से मिल गई । ठाकुर कुशाल सिंह की व्यूह-रचना सफ़ल होने लगी और अंग्रेजो के ख़िलाफ़ एक मजूबत मोर्चा आउवा में बन गया ।
अब मुक्ति-वाहिनी ने जोधपुर को अंग्रेजो के चंगुल से छुड़ाने की योजना बनाई । उसी समय दिल्ली में क्रांतिकारियों की स्थिति कमज़ोर होने के समाचार आउवा ठाकुर को मिले कुशल सिंह ने सभी प्रमुख लोगों के साथ फिर से अपनी युद्ध-नीति पर विचार किया ।

सबकी सहमति से तय हुआ कि सेना का एक बड़ा भाग दिल्ली के स्वाधीनता सैनिकों की सहायता के लिऐ भेजा जाए तथा शेष सेना आउवा में अपनी मोर्चेबन्दी मज़बूत कर ले । दिल्ली जाने वाली फ़ौज की समान आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह को सौंपी गई ।
शिवनाथ सिंह आउवा से त्वरित गति से निकले तथा रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया । उधर ब्रितानियों ने भी मुक्ति वाहिनी पर नज़र रखी हुई थी । नारनौल के पास ब्रिगेडियर गेरार्ड ने क्रांतिकारियों पर हमला कर दिया । अचानक हुए इस हमले से भारतीय सेना की मोर्चाबन्दी टूट गई । फिर भी घमासान युद्ध हुआ तथा फ़िरंगियों के कई प्रमुख सेनानायक युद्ध में मारे गए ।

बड़सू का भीषण संग्राम :-

जनवरी में मुम्बई से एक अंग्रेज फौज सहायता के लिए अजमेर भेजी गई । अब कर्नल होम्स ने आउवा पर हमला करने की हिम्मत जुटाई । आस-पास के और सेना इकट्ठी कर कर्नल होम्स अजमेर से रवाना हुआ ।
20 जनवरी, 1858 को होम्स ने ठाकुर कुशाल सिंह पर धावा बोला दिया । दोनों ओर से भीषण गोला-बारी शुरू हो गई ।
आउवा का किला स्वतंत्रता संग्राम के एक मजबूत स्तंभ के रूप में शान से खड़ा हुआ था । चार दिनों तक अंग्रेजो और मुक्ति वाहिनी में मुठभेड़ें चलती रहीं। अंग्रेजो के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हो रहे थे । युद्ध की स्थिति से चिंतित होम्स ने अब कपट का सहारा लिया । आउवा के कामदार और क़िलेदार को भारी धन देकर कर्नल होम्स ने उन्हें अपनी ही साथियों की पीठ में छुरा घौंपने के लिए राज़ी कर लिया ।

एक रात क़िलेदार ने कीलें का दरवाजा खोल दिया । दरवाज़ा खुलते ही अँग्रेज़ क़िले में घुस गए तथा सोते हुए क्रांतिकारियों को घेर लिया । फिर भी स्वातंत्र्य योद्धाओं ने बहादुरी से युद्ध किया, पर अँग्रेज़ क़िले पर अधिकार करने में सफल हो गए । पासा पटलते देख ठाकुर कुशाल सिंह युद्ध जारी रखने के लिए दूसरा दरवाज़े से निकल गए ।
उधर अंग्रेजो ने जीत के बाद बर्बरता की सारी हदें पार कर दी । उन्होंने आउवा को पुरी तरह लूटा, नागरिकों की हत्याएँ की तथा मंदिरों को ध्वस्त कर दिया । क़िले कि प्रसिद्ध महाकाली की मूर्ति को अजमेर ले ज़ाया गया । यह मूर्ति आज भी अजमेर के पुरानी मंडी स्थित संग्रहालय में मौजूद है ।

इसी के साथ कर्नल होम्स ने सेना के एक हिस्से को ठाकुर कुशाल सिंह का पीछा करने को भेजा । रास्ते में सिरियाली ठाकुर ने अंग्रेजों को रोका । दो दिन के संघर्ष के बाद अंग्रेज सेना आगे बढ़ी तो बडसू के पास कुशाल सिंह और ठाकुर शिवनाथ सिंह ने अंग्रेजों को चुनौती दी ।

उनके साथ ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह भी हो गए । बगड़ी ठाकुर ने भी उसी समय अंग्रेजों पर हमला बोल दिया । चालीस दिनों तक चले इस युद्ध में कभी मुक्ति वाहीनी तो कभी अंग्रेजों का पलड़ा भारी होता रहा । तभी और सेना आ जाने से अंग्रेजों की स्थिति सुधर गई तथा स्वातंत्र्य-सैनिकों की पराजय हुई । कोटा तथा आउवा में हुई हार से राजस्थान में स्वातंत्र्य-सैनिकों का अभियान लगभग समाप्त हो गया ।

आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने अभी भी हार नहीं मानी थी । अब उन्होंने तात्या टोपे से सम्पर्क करने का प्रयास किया । तात्या से उनका सम्पर्क नहीं हो पाया तो वे मेवाड़ में कोठारिया के राव जोधसिंह के पास चले गए । कोठारिया से ही वे अंग्रेजों से छुट-पुट लड़ाईयाँ करते रहे ।

ठाकुर कुशालसिंह के संघर्ष ने मारवाड़ का नाम भारतीय इतिहास में पुनः उज्ज्वल कर दिया । कुशाल सिंह पूरे मारवाड़ में लोकप्रिय हो गए तथा पूरे क्षेत्र के लोग उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानने लगे । जनता का उन्हें इतना सहयोग मिला था कि लारेंस तथा होम्स की सेनाओं पर रास्ते में पड़ने वाले गाँवों के ग्रामीणों ने भी जहाँ मौक़ा मिला हमला किया ।

इस पूरे अभियान में मुक्ति-वाहिनी का नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से भी संपर्क बना हुआ था । इसीलिए दिल्ली में स्वातंत्र्य-सेना की स्थिति कमज़ोर होने पर ठाकुर कुशाल सिंह ने सेना के बड़े भाग को दिल्ली भेजा था । जनता ने इस संघर्ष को विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध किया जाने वाला स्वाधीनता संघर्ष माना तथा इस संघर्ष के नायक रूप में ठाकुर कुशाल सिंह को लोक-गीतों में अमर कर दिया ।

उस समय के कई लोक-गीत तो आज भी लोकप्रिय हैं ।
होली के अवसर पर मारवाड़ में आउवा के संग्राम पर जो गीत गाया जाता है,
उसकी बानगी देखिये :-

वणिया वाली गोचर मांय कालौ लोग पड़ियौ ओ
राजाजी रे भेळो तो फिरंगी लड़ियो ओ
काली टोपी रो !
हाँ रे काली टोपी रो । फिरंगी फेलाव कीधौ ओ
काली टोपी रो !

बारली तोपां रा गोळा धूडगढ़ में लागे ओ
मांयली तोपां रा गोळा तम्बू तोड़े ओ
झल्लै आउवौ !

मांयली तोपां तो झूटे, आडावली धूजै ओ
आउवा वालौ नाथ तो सुगाली पूजै ओ
झगड़ौ आदरियौ !
हां रे झगड़ौ आदरियो, आउवौ झगड़ा में बांकौ ओ
झगडौ आदरियौ !

राजाजी रा घेड़लिया काळां रै लारे दोड़ै ओ
आउवौ रा घेड़ा तो पछाड़ी तोड़े ओ
झगड़ौ होवण दो !
हाँ रे झगड़ौ होवण दो, झगड़ा में थारी जीत व्हैला ओ
झगड़ौ होवण दो !

पन्नाधाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान

रानी बाघेली !
भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है,
इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था |

ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया,
पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को |

रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |

28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया |
और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया |
इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे |
तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |

तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था |
उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी |
उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई |
यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |

छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |

यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर
राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी |

हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता? नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को !